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मंगलवार, 22 अगस्त 2017

हे देवी,पत्नी-परमेश्वरी 

हे  देवी,  पत्नी-परमेश्वरी 
हृदयवासिनी,तू हृदयेश्वरी 

शांतिदायिनी,सुखप्रदायिनी 
अंकशायिनी ,मन लुभावनी 
नवरस भोजन ,स्वाददायिनी 
सब घरभर का बोझ वाहिनी 
मैं तुम्हारा ,दास  अकिंचन ,
सुख दुःख की तुम ,मीत सहचरी 
हे  देवी  पत्नी -परमेश्वरी 

विधि ने तुमको स्वयं बनाया 
खिले कमल सी,कोमलकाया 
महक पुष्प सी,चहक खगों की 
चंचलता और चाल  मृगों  की 
रक्तिम अधर,नयन कजरारे,
कंचन तन की छवि सुनहरी 
हे  देवी - पत्नी परमेश्वरी 

तेरी पूजा ,तेरा  अर्चन 
कर पुलकित होता मेरा मन 
अन्नपूर्णा ,लक्ष्मी है तू 
मैं श्रद्धानत ,तुझको पूजूं 
खुशियां बरसाती जीवन में,
बन कर प्यार भरी तू बदरी 
हे  देवी  पत्नी -परमेश्वरी 

कनकछड़ी सी सुंदर मूरत 
प्रेम घटों से छलके  अमृत 
मैं तुम्हारा ,दास अकिंचन 
निशदिन करू,तुम्हारा वंदन 
रूप गर्विता ,प्रेम अर्पिता 
प्यारी सुन्दर ,छवि नित निखरी 
हे  देवी  पत्नी -परमेश्वरी 
मन को भाता ,मुख मुस्काता 
देख हृदय प्रमुदित हो जाता 
तेरे एक इशारे भर पर 
मैं चकरी सा,खाता चक्कर 
तेरे आगे ,उठ ना पाती ,
नजर हमारी ,डरी डरी 
हे  देवी  पत्नी-परमेश्वरी 

आस लगाए बैठा ये मन 
दे दो मधुर ,अधर का चुंबन 
बाँध मुझे बाहु बंधन में 
उद्वेलन भरदो तन मन में 
पा ये प्रेम प्रसाद आस्था ,
दिन दिन बढे और भी गहरी 
हे  देवी  पत्नी-परमेश्वरी 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

गुरुवार, 17 अगस्त 2017

भारत देश महान चाहिए
 
पतन गर्त में बहुत गिर चुके,अब प्रगति,उत्थान चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान   चाहिए  

ऋषि मुनियों की इस धरती पर,बहुत विदेशी सत्ता झेली
शीतल मलयज नहीं रही अब ,और  हुई  गंगा भी मैली 
अब ना सुजलां,ना सुफलां है ,शस्यश्यामला ना अब धरती 
पंच गव्य का अमृत देती ,गाय सड़क पर ,आज विचरती 
भूल   धरम की  सब  मर्यादा ,संस्कार भी सब  बिसराये 
 कहाँ गए वो हवन यज्ञ सब,कहाँ गयी वो वेद ऋचाये 
लुप्त होरहा धर्म कर्म अब ,उसमे  नूतन  प्राण चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए  

परमोधर्म  अहिंसा माना ,शांति प्रिय इंसान बने हम 
ऐसा अतिथि धर्म निभाया,बरसों तलक गुलाम बने हम 
पंचशील की बातें करके ,भुला दिया ब्रह्मास्त्र बनाना 
आसपास सब कलुष हृदय है,भोलेपन में ये ना जाना 
मुंह में राम,बगल में छुरी ,रखनेवाले  हमे ठग गए 
सोने की चिड़िया का सोना,चुरा लिया सब और भग गए 
श्वेत कबूतर बहुत उड़ाए ,अब तलवार ,कृपाण चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए 

अगर पुराना वैभव पाना है ,तो हमें बदलना होगा 
जिस रस्ते पर दुनिया चलती उनसेआगे चलना होगा 
सत्तालोलुप कुछ लोगों से ,अच्छी तरह निपटना होगा 
सत्य अहिंसा बहुत हो गयी,साम दाम से लड़ना होगा 
हमकोअब चाणक्य नीति से,हनन दुश्मनो का करना है 
वक़्त आगया आज वतन के,खातिर जीना और मरना है 
हर बंदे के मन में जिन्दा ,जज्बा और  तूफ़ान चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान  चाहिए 

कभी स्वर्ग से आयी थी जो,कलकल करती गंगा निर्मल 
हमें चाहिए फिर से वो ही ,अमृत तुल्य,स्वच्छ गंगाजल 
भारत की सब माता बहने ,बने  विदुषी ,लिखकर पढ़कर  
उनको साथ निभाना होगा ,साथ पुरुष के ,आगे बढ़ कर 
आपस का मतभेद भुला कर ,भातृभाव फैलाना  होगा 
आपस में बन कर सहयोगी ,सबको  आगे आना होगा 
हमे गर्व से फिर जीना है ,और पुरानी  शान चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए 

सभी हमवतन ,रहे साथ मिल ,तोड़े मजहब की दीवारे 
छुपे शेर की खालों में जो ,कई भेड़िये ,उन्हें  संहारे 
जौहर में ना जले  नारियां ,रण में जा दिखलाये जौहर 
पृथ्वीराज ,प्रताप सरीखे ,वीर यहाँ पैदा हो घर घर 
कर्मक्षेत्र या रणभूमि में ,उतरें पहन बसंती बाना 
कुछ करके दिखलाना होगा,अगर पुराना वैभव पाना 
झाँसी की रानी के तेवर और आत्म सन्मान चाहिए 
हमको अपने सपनो वाला वो ही हिन्दुस्थान चाहिए  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'







बुधवार, 16 अगस्त 2017

आओ,कुछ इंसानियत दिखाए 

खुदा ने जब कायनात को बनाया 
तो उसे कुदरत के रंगो  से सजाया  
नदियाएँ बहने लगी 
सबको मीठा जल देने लगी 
फिर वृक्ष बनाये 
उनमे मीठे मीठे फल आये  
हवाएं बहने लगी 
सबको ठंडक देने लगी 
पहाड़ो पर हरियाली छाई 
ग्रीष्म,शीत ,बारिश और बसंत ऋतू आई 
सूरज ने प्रकाश और ऊष्मा फैलाई 
चाँद ने रात में शीतलता बरसाई 
फूल महकने लगे 
पंछी चहकने लगे 
सबने ,जितना जो दे सकता था ,
खुले हाथों दिया 
और बदले में कुछ नहीं लिया 
और फिर जब भगवान ने इंसान को बनाया 
तो उसने प्रकृति की इन सारी नियामतों का ,
भरपूर फायदा उठाया 
और बदले में क्या दिया 
पेड़ों को कटवा दिया
पहाड़ों का किया दोहन 
 बिगाड़ दिया पर्यावरण 
स्वार्थ में होकर अँधा  
नदियों का पानी किया गंदा 
एक दुसरे से लड़ने लगा  
जमीन के लिए झगड़ने लगा  
धरम के नाम पर आपस में फूट डाल  ली 
कितनी ही बुराइयां पाल ली 
अब तो इस बैरभाव की इंतहा होने लगी है 
धरती भी परेशां होने लगी है 
अब समय आगया है कि हम कुछ सोचे,विचारे 
अपने आप को सँवारे 
अपने फायदे के लिए ,
दूसरों को ना करे बर्बाद 
इसलिए आप सब से है फ़रियाद 
हम इंसान है,थोड़ी इंसानियत फैलाएं 
भाईचारे से रहे ,एक दुसरे के काम आये 
तो आओ ,ऐसा कुछ करें ,
जिससे हमारी छवि सुधरे 
चलो हम किसी रोते  को हंसाये  
किसी भूखे को पेट भर खिलाये  
किसी बिछुड़े को मिलाते है 
किसी गिरते को उठाते है  
किसी प्यासे की प्यास मिटाये 
किसी दुखी का दर्द हटाए 
किसी असहाय को सहारा दे 
किसी डूबते को किनारा दे 
किसी बुजुर्ग के दुःख काटे 
किसी बीमार को दवा बांटे 
किसी को अन्धकार से उजाले में लाये 
किसी भटके को सही राह दिखलाये 
किसी अबला की इज्जत ,लूटने न  दे 
किसी बच्चे का ख्वाब टूटने न दे  
किसी अनपढ़ को चार लफ्ज सिखला दे 
किसी अंधे को रास्ता पार करा दे 
किसी के रास्ते से बुहार दे कांटे 
जितना भी हो सके,सबमे प्यार बांटे 
करे कोशिश कि कोई लाचार न हो 
कम से कम कुछ  ऐसा करे,
जिससे इंसानियत शर्मशार न हो
हमें आजादी मिले बीत गए है सत्तर साल 
फिरभी बिगड़ा हुआ है हमारा हाल 
आपसी मतभेद बढ़ता जा रहा है 
देश का माहौल बिगड़ता जा रहा है 
अरे सत्तर साल की उमर में तो,
झगड़ालू मियां बीबी भी शांति से रहते है 
टकराव छोड़ कर प्रेम की धरा में बहते है 
इसलिए हम मिलजुल कर रहे साथ साथ 
अब गोली से नहीं,गले लगाने से बनेगी बात  
तो आओ ,मिलजुल कर भाईचारे से रहें,
आपस में न लड़े 
ऐसा कुछ न करे जिसका खामियाजा ,
हमारी आनेवाली पीढ़ी को  भुगतना पड़े  
हर तरफ चैन और अमन रहे छाया 
जिससे ऊपरवाले को भी अफ़सोस न हो ,
कि उसने इंसान को क्यों बनाया?  
इसलिए हम साथ साथ आये 
और थोड़ी इंसानियत फैलाये 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
      कभी कभार  

 हाय हाय कर हाथ हिलाती 
 बाय बाय कर हाथ हिलाती 
कभी कभार हाथ से मेरे ,
अपने कोमल हाथ  मिला दो 
चढ़ी सदा रहती हो सर पर 
चैन  न  लेने देती पल  भर
कभी कभार ढील देकर तुम,
मेरे दिल का कमल खिला दो 
मुझ से रहती सदा झगड़ती 
सारा दोष मुझी  पर मढ़ती 
रहती हरदम तनी तनी सी ,
कभी कभार झुको तो थोड़ा 
कभी कभार नैन मिल जाए 
कभी कभार  चैन मिल जाए 
हरदम भगती ही रहती हो,
कभी कभार रुको तो थोड़ा 
 रोज रोज ही घर का खाना 
वो ही रोटी,दाल  पकाना 
कभी कभार किसी होटल में ,
स्वाद बदलने का मौक़ा दो 
रोज शाम तक थकी थकी सी 
रहती हो तुम पकी पकी  सी 
कभी कभार मिलो सजधज कर ,
मुझको भी थोड़ा चौंका दो 
काम धाम में सदा  फंसी तुम 
रहती घर में घुसी घुसी तुम 
कभी कभार निकल कर घर से,
साथ घूमने जाएँ हम तुम 
घर का बंधन ,जिम्मेदारी 
यूं ही उमर बिता दी सारी 
कभी कभार बाहों में भर कर ,
मुझको बंधन में बांधो तुम 
जिन होठों पर सदा शिकायत 
और बक बक करने की आदत 
कभी कभार उन्ही होठों से ,
दे दो मुझे प्यार से चुंबन 
जिन आँखों का एक इशारा 
मुझे नचाता दिन भर सारा 
कभी कभार उन्ही आँखों से,
कर दो थोड़ा प्यार प्रदर्शन 
लगे एक रस जब ये जीवन 
तब आवश्यक है परिवर्तन 
कभी कभार 'ब्रेक' जब मिलता,
तो कितना अच्छा लगता है 
थोड़ी थोड़ी रोक टोक हो 
थोड़ी थोड़ी नोक झोंक हो 
कभी कभार अगर झगड़ा हो,
प्यार तभी सच्चा लगता है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

क्या इसीलिये हम है स्वतंत्र 

आओ हाथों में पत्थर ले ,हम एक दूसरे पर  फेंकें 
 मन की भड़ास कोदूर करें  ,हम औरों को गाली देके 
एक दूजे की टांग खींच हम ,कोई को भी ना बढ़ने दे  
कोई ना दोस्त किसीका हो,सबको आपस में लड़ने दे 
अपनी निर्माण शक्तियों को हम चलो बनादे  विध्वंशक 
अपने प्रगतिशील विचारों को ,ले जाएँ हम बर्बादी तक 
आजादी की अभिव्यक्ति का हर व्यक्ति लाभ पूरा ले ले 
एक दूजे पर कालिख पोते ,और कीचड़ से होली खेलें 
हम एक दूजे की निंदा कर ,फैलाये गंदगी यत्र तत्र 
क्या ये मतलब आजादी का ,क्या इसीलिये हम है स्वतंत्र 

घोटू 
भाग्य ना बदल सकोगे 

दिन भर लगे काम में रहते,करते मेहनत 
किसके लिए सहेज रहे हो तुम ये दौलत 
क्योंकि तुमको कोई न बुढ़ापे में  पूछेगा 
जो भी तुमने किया ,फर्ज था ,यह कह देगा 
फिर भी ये तुम्हारी ममता या पागलपन 
सोच रहे उसके भविष्य की हो तुम हर क्षण
लाख करो कोशिश ,भाग्य न बदल  पाओगे 
उसके खतिर ,कितना ही धन छोड़ जाओगे 
निकला नालायक ,फूंकेगा,सारी  दौलत 
कर देगा  बरबाद ,तुम्हारी सारी मेहनत 
उसमे कूवत होगी ,ढेर कमा वो लेगा 
ढंग से अपना ,घर संसार ,जमा वो लेगा 
इसीलिये तुम चाहे जी भर उसे प्यार दो 
देना है ,तो उसको अच्छे संस्कार  दो 
अगर बनाना है तो लायक उसे बनाओ 
बुद्धिमान और सबका नायक उसे बनाओ 

मदन मोहन बाहेती'घोटू;' 
मोह माया को कब त्यागोगे 

इस सांसारिक सुख के पीछे ,तुम कब तक,कितना भागोगे 
दुनियादारी में उलझे हो , मोह  माया  को  कब  त्यागोगे 

झूंठे है सब रिश्ते नाते ,ये है तेरा  ,ये है मेरा 
तुम तो हो बस एक मुसाफिर ,दुनिया चार दिनों का डेरा 
पता नहीं कब आये बुलावा ,सोये हो तुम,कब जागोगे 
इस सांसारिक सुख के पीछे,तुम कब तक ,कितना भागोगे
 
धरी यहीं पर रह जायेगी ,ये तुम्हारी दौलत सारी 
साथ न जाती कुछ भी चीजें,जो तुमको लगती है प्यारी 
कुछ घंटे भी नहीं रखेंगे,जिस दिन तुम काया त्यागोगे 
इस सांसारिक सुख के पीछे,तुम कब तक,कितना भागोगे
 
सबके सब है सुख के साथी,नहीं किसी में सच्ची निष्ठां 
खाये सब पकवान रसीले,अगले दिन बन जाते विष्ठा 
जरूरत पर सब मुंह फेरेंगे,अगर किसी से कुछ मांगोगे 
इस सांसारिक सुख के पीछे,तुम  कब तक ,कितना भागोगे 

मदन मोहन बहती'घोटू'

सोमवार, 14 अगस्त 2017

जल से 

ए जल ,
चाहे तू पहाड़ों पर 
उछल उछल कर चल 
या झरने सा झर 
या नदिया बन  कर
कर तू  कल कल 
या कुवे में रह दुबक कर 
या फिर तू सरोवर 
की चार दीवारी में रह बंध कर 
या बर्फ बन जा जम कर 
या उड़ जा वाष्प बन  कर 
या फिर बन कर  बादल 
तू कितने ही रूप बदल 
तेरी अंतिम नियति है पर  
खारा समंदर 

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
ये बूढ़े बड़े काँइयाँ होते है 

अरे ये तो सबके आनेवाले जीवन की परछाइयां होते है 
जाने क्यों लोग कहते है कि ये बुड्ढे बड़े काँइयाँ  होते है 

जवानी की  कटती हुई पतंग को ,उछल उछल  कर 
ये कोशिश करते  है ,और रखते है पकड़ पकड़ कर 
और उसे फिर से उड़ाने का ,करते रहते है प्रयास 
अपनी ढलती हुई उम्र में भी,मन में लेकर के ये आस 
ऊपरवाले की कृपा से ,शायद किस्मत मेहरबान हो जाए 
या उनकी डोर किसी नई नवेली पतंग से उलझ जाए 
क्योकि पुराने पतंगबाज है ,पेंच लड़ाने  में  माहिर है 
लाख कंट्रोल  करें,पर मचलता ही रहता उनका दिल है 
इसलिए कोशिश कर के ,बहती गंगा में हाथ धोते है 
जाने क्यों लोग कहते है कि ये बुड्ढे बड़े  काँइयाँ होते है 

भले ही धुंधलाई सी नज़रों से ,साफ़ नज़र नहीं आता है 
सांस फूल जाती है ,ठीक से चला  भी नहीं जाता  है 
भले ही निचुड़े हुए कपड़ों की तरह शरीर पर सल हो 
चेहरे पर बुढ़ापा ,स्पष्ट नज़र आता हो ,लगते दुर्बल हो 
मगर सजधज कर ,आती जाती महिलाओं को ताड़ते है
कभी तिरछी नज़र से देखते ,या कभी  आँखे फाड़ते है 
बस कुछ ही समझदार है जो कि अपनी उमर विचारते है 
और अपने जैसी ही किसी बुढ़िया पर ,लाइन  मारते है 
वरना बाकी सब तो बस जवान हुस्न के सपने संजोते है 
जाने क्यों लोग कहते है कि ये बुड्ढे बड़े काँइयाँ होते है 

हर  बुजुर्ग का अलग अलग ही ,अपना  हाल होता है 
कोई मालामाल होता है तो कोई खस्ताहाल  होता है 
कोई थका तो नहीं है पर फिर भी  रिटायर हो गया है
कोई झुकी हुई  डाल का ,पका हुआ फल हो गया है 
किसी के बच्चे उसे छोड़ कर ,हो गए विदेश वासी है 
इसलिए उसके जीवन में तन्हाई और छाई उदासी है 
फिर भी परिस्तिथियों से समझौता कर के ये जीते है 
बाहर से मुस्कान ओढे रहते  है पर अंदर से  रीते है 
ये अकेलेपन के सताये हुए है,और तन्हाईयाँ ढोते है 
जाने क्यों लोग कहते है कि ये बुड्ढे बड़े काँइयाँ होते है 

ऐसे में जो मन बहलाने को जो इधर उधर ताक लेते है 
आते जाते सौंदर्य की तरफ, जो चुपके से  झांक लेते है 
तो ये कोई इनकी शरारत नहीं ,थोड़ा सा टाइमपास है 
जी को लगाने के लिए ये  बस ये ही तो हास परिहास  है 
इनकी हरकतों पर नहीं ,इनकी मनोस्तिथि पर गौर करो 
इनको संवेदना दिखलाओ,इनकी परिस्तिथि पर गौर करो 
इन  हालातों में भी ,उनके जीने के जज्बे को सलाम करो 
इन्हे इज्जत बख्शो ,इनके चरण छुवो और  प्रणाम  करो 
क्योकि आशीर्वाद देने  को ,इनके हाथ हमेशा उठे होते है 
जाने क्यों लोग कहते है कि ये बुड्ढे बड़े काँइयाँ होते है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
       कृष्णजी का हैप्पी बर्थडे 

माखनचोर बर्थडे  तेरा  ,ख़ुशी ख़ुशी  इस तरह मनाया 
दफ्तर में ,अपने साहब पर ,मैंने  मख्खन खूब  लगाया 
बढ़ती हुई उमर में अपनी ,रास रचाना ,रास न आये 
बालकृष्ण  के जन्मदिवस पर ,उजले बाल, कृष्ण करवाये  
रख कर, दिन भर व्रत ,तुम्हारे जन्मदिवस की ख़ुशी मनाई 
मुझे  रिटर्न गिफ्ट में अब तुम  ,दे दो इतना ज्ञान कन्हाई 
छोड़ी मथुरा ,गए द्वारिका ,यह तो अब बतलादो नटवर 
मज़ा समन्दर तीरे ज्यादा आया या यमुना के तट पर 
तुमने आठ आठ रानी संग , तार तम्य कैसे बिठलाया 
कैसे सबके साथ निभाया, मैं तो  एक संभाल न पाया
ओ  गीता के ज्ञानी  गायक ,कैसी थी तुम्हारी माया 
रह कर बने तटस्थ सारथी ,युद्ध  पांडवों को जितवाया  
उस बंशी में क्या जादू था,राधा मुग्ध हुई जिस धुन पर 
क्यों लड्डूगोपाल रूप में ,अब भी पूजे जाते घर घर 
लोग  आपको खुश करने को , राधे राधे क्यों  है गाये 
इतनी बात अगर समझा दो,मेरा जनम सफल हो जाये  

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 9 अगस्त 2017

समृद्धि और संतोष  

आज मैं जब बह किसी बच्चे को ,
मोबाईल पर देर तक 
अपने किसी दोस्त से ,
करते हुए देखता हूँ गपशप 
मुझे अपने बचपन के ,
दिनों  के वो छोटे छोटे डब्बे है याद आते 
जिनमे छेद  कर के,
एक मोटे  से धागे से बाँध कर ,
हम टेलीफोन थे बनाते 
और अपने दोस्तों से 
बड़ी शान से थे बतियाते 
वो अस्पष्ट से सुनाई देते हुए शब्द,
और वो फुसफुसाते हुए होठ ,
हमे कर देते थे निहाल जितना 
आज का आई फोन भी,
 सुख नहीं दे पाता उतना 
एक छोटी सी दूरबीन,
 जिसके एक सिरे पर ,
फिल्म की कटिंग की छोटी छोटी तस्वीर 
जब दुसरे सिरे पर लगे लेंस से ,
बड़ी बड़ी नज़र आती थी 
हमारी बांछें खिल जाती थी 
या फिर हाट,बाज़ार,मेले का वो बाइस्कोप 
जब ताजमहल से लेकर ,
नहाती मोटी  धोबन के दर्शन था कराता  
हमे कितना मज़ा था आता 
जो सुख आज टीवी या पीवीआर,
 के सिनेमा घरों में भी नहीं मिल पाता 
बड़े बड़े दस मंजिली स्टार क्रूज़ में बैठ कर 
या गोवा या पट्टेया के स्पीड बोट  में सैर कर 
आज हम वो आनंद नहीं महसूस कर पाते 
जो बरसात में हमें मिलता था ,
जब हम घर के आगे की बहती नाली में,
कागज की नाव थे तैराते 
दूर आसमान में उड़ते हुए हवाईजहाजों को ,
देख कर ,उनके साथ साथ की दौड़ 
बिजनेस क्लास में हवाई सफर के ,
आनंद  को देती है पीछे छोड़ 
कहाँ तब का गर्मी की रातों में ,
अपने परिवार के साथ ,खुली छतों पर ,
तारे गिनते हुए ,ठंडी ठंडी हवा में सोना 
कहाँ  अब का ,मन बहलाने के लिए ,
गर्मी में किसी हिलस्टेशन पर ,
पांच सितारा होटल के ए सी रूम का 
ये गुदगुदा बिछौना 
दोनों में है कितना अंतर 
कौन था ज्यादा सुखकर 
पहले हम हर छोटी छोटी सुविधा में ,
खुशियां ढूंढते थे ,और संतोष से जीते थे 
मिट्टी की मटकी का ठंडा पानी खुश हो पीते थे 
और जिंदगी में आज ,
इतनी सुख और सुविधाएँ उपलब्ध है ,
पर मन में संतोष नहीं है 
ये जमाने की रफ़्तार है ,
पर क्या इसमें हमारा दोष नहीं है? 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
जिंदगी और मिठाइयां 

हमारी जिंदगी में  ,
मिठाइयों का रोल है कितना अहम 
कि अपनी कोई भी ख़ुशी का प्रदर्शन 
मिठाई बाँट कर ही करते है हम 
जन्मदिन हो या विवाह हो 
या पूरी हुई ,संतान पाने की चाह हो 
आपने नया घर बनाया हो 
या बच्चे का अच्छा रिजल्ट आया हो 
सगाई हो या रोका हो 
कोई भी ख़ुशी का मौक़ा हो 
त्योंहार हो या कोई शुभप्रसंग 
अपनी प्रसन्नता प्रकट करने का ,
सबसे अच्छा ढंग 
यह कि सब मिलने जुलने वालों का ,
मुंह मीठा करवाया जाता है 
मिठाइयों का खुशीयों  से ,
चोली और दामन का नाता है  
अरे और तो और ,
भगवान से जब लेना होता है आशीर्वाद 
तो उन्हें भी चढ़ाया जाता है ,
मिठाइयों का ही परशाद 
गणेश जी को मोदक और ,
हनुमानजी को बेसन के लड्डू भाते है 
और कृष्ण भगवान को,
छप्पन भोग चढ़ाते है  
पर आजकल हम,
 मोटा न होने के चक्कर में 
या फिर डाइबिटीज के डर में 
जब परहेज से रहते है,
मिठाइयां नहीं खाते है 
हम दुनिया की कितनी अच्छी चीजों के ,
स्वाद से वंचित रह जाते है 
गरम गरम रस टपकाती जलेबियाँ 
जो पहली नज़र में ही चुरा लेती है जिया 
मुंह में पानी आ जाता है जिनका नाम सुन 
रसगुल्ले या गुलाबजामुन 
दूर से अपनी और खींचता है जिनका जलवा 
मूंग की दाल का या गाजर का हलवा 
देखते हम जिन पर हो जाते है लट्टू 
बूंदी के प्यारे प्यारे गोलमोल लड्डू 
क़त्ल करता हुआ ,चांदी की वर्क चढ़ी ,
काजू की कतलियों का यौवन 
देख कर नहीं डोलेगा किसका मन 
और वो आपके सामने अंगड़ाइयां भरती 
रस भरी प्यारी सी इमरती 
या  वो मन मोहते हुए रबड़ी के लच्छे 
देख कर मुंह में पानी भरते अच्छे अच्छे 
लवंगलता और बालूशाही की मिठास 
जो आपके लिए बनी है ख़ास 
 ये इतनी सारी मिठाइयां ,
आपको दे रही हो निमंत्रण 
और ललचाई नज़रों से ,
आप खुद पर कर रहे है नियंत्रण 
क्यों आप इन सबका मोह त्याग कर, बेकार 
अपनी जुबान पर करते है अत्याचार 
क्योंकि यदि आप अपनी जिव्हा को तरसाएगे 
तो बड़ा दुःख पाएंगे 
अरे अगर कुछ केलोरियाँ ,
ज्यादा भी खा ली जाएंगी 
दो चार किलोमीटर घूमने में जल जाएंगी 
पर बिना खाये जो आपका मन जलेगा 
आपको बहुत खलेगा 
ये दो इंच की लपलपाती जिव्हा 
जब तक तृप्त रहेगी 
तब तक मस्त रहेगी 
अगर मीठा खायेगी 
तो मीठा बतियायेगी 
और अगर तरसेगी 
तो कहर बन के बरसेगी 
और  अगर ये गलती से मचल गयी 
बगावत करके फिसल गयी 
तो फिर ये बड़ा सताएगी 
मुंह से निकली बात वापस  न आएगी 
इसलिए इस रसना को। 
रसास्वादन करने दो 
इसे तृप्त रखो ,इसमें मिठास भरने दो 
मीठा मीठा बोल कर सबका मन लुभावो 
जी भर के मिठाइयां खाओ ,
और सबको खिलाओ 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शनिवार, 5 अगस्त 2017

चकमक या बुझता अंगारा 

जवानी में हमारे जिस्म,
चकमक पत्थर की तरह होते है ,
जिनके आपस में टकराने से ,
चिंगारियाँ  निकलती है 
और आग जलती है 
लेकिन बुढ़ापे में ,हो जाते है 
उस बुझते हुए कोयले की तरह 
जिनके ऊपर चढ़ी रहती है,
राख की सतह 
जो कभी कभी हवा के झोंके के आने पर 
थोड़ी सी उड़ जाती है 
और तब बुझते हुए अंगारों की ,
थोड़ी सी दहक नज़र आती है 
जो आज भी ,
अपनी तपिश का दम भरती  है 
अरे गुलाब की सूखी पखुड़ियों में भी ,
थोड़ी खुशबू हुआ करती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


ये दिल कितना पगला होता 

बीती बातें भुला न पाता ,लक्ष्य सामने अगला होता 
ये दिल कितना पगला होता 
अपनी तीन गर्लफ्रेंडों संग ,वो मुश्किल से निभा रहा है 
लेकिन फिर भी मन ना भरता,वो चौथी को पटा रहा है  
उसे पता जब शादी होगी, बीबी नहीं भटकने  देगी 
कन्ट्रोल रख ,नहीं किसीको ,उसके पास फटकने देगी 
लेकिन फिर भी,उनके पीछे,ये दीवाना  कंगला होता 
ये दिल कितना पगला होता 
मौज मस्तियाँ ,चार दिनों की,यूं ही अचानक छूट जायेगी 
परिवार का भार पड़ेगा  ,यारी सारी ,टूट   जायेगी 
वो अपने घर,तुम अपने घर,देख नहीं पहचानो तक भी 
पत्नीजी के अनुशासन में ,नहीं सकोगे ,उसको तक भी 
इधर उधर की सोच बावला ,क्यों फिर यूं ही गंदला होता 
ये दिल कितना पगला होता 
ये तो लालच का मारा है,माँगा करता ,मोर हमेशा 
साथ एक के रहते रहते ,हो जाता है ,बोअर हमेशा 
दिखता कितना ही शरीफ हो,मन में रहता चोर हमेशा 
कितना ही शाकाहारी हो ,रहता आदमखोर  हमेशा 
और ये चक्कर नहीं छूटता ,चाहे सर है टकला होता 
ये दिल कितना पगला होता 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
माँ के हाथ का खाना 

हलवा ,पूरी ,आलू ,होते ,स्वाद बहुत भंडारे के 
तृप्ति मिलती ,जब छकते है लंगर हम गुरद्वारे के 
माँ के हाथों बनी ,दाल और रोटी की लज्जत आगे,
फीके लगते ,सारे व्यंजन,होटल पांच  सितारे  के 

घोटू 

बुधवार, 2 अगस्त 2017

दिल दरिया होता 

एक पल प्यार का जो, उनके संग जिया होता 
तड़फते दिल को सुकूं ,मिला  शर्तियां  होता 
डाइबिटीज का भी खतरा हम उठा लेते ,
मीठी बातों से उनने जीत दिल लिया होता 
चाह  थी डाले गले में हम ,सूत्र मंगल का ,
सूत्र राखी का उनने बाँध ना दिया  होता 
दिल में बसने की उनने राह चुनी लम्बी सी,
जल्दी आ जाते अगर शॉर्टकट  लिया होता 
दिल  अगर तोड़ना था ,तोड़ते वो धीरे से,
टुकड़े टुकड़े  न उसे इस तरह किया होता 
सुना तो है बहुत,देखा न अब तलक 'घोटू'
होता छोटा सा ,लोग कहते ,दिल दरिया होता 

मदनमोहन बाहेती'घोटू'
आँखे जाती पनिया है 

दिखाती रंग अजब ,कैसे कैसे दुनिया है 
मुफ्त बदनाम हुआ करती यूं ही मुनिया है 
छुआ न जिंदगी में जिसने निरामिष भोजन ,
ऐसे बन्दे को भी हो जाता  चिकनगुनिया है 
मन्नते पूरी करता ,देख  कर चढ़ावा   है ,
आजकल हो रहा,भगवान तू भी बनिया है 
सरे बाज़ार ,उठा कर के लूट ली जाती ,
बड़ा दुःख देने लगी ,आजकल नथुनिया है 
जहाँ पर महकते ,गुलाब,जूही ,चंपा थे,
वहां पर आजकल उग आयी नागफनियाँ है 
आसमाँ पर चढ़े है भाव अब टमाटर के ,
कभी मुश्किल से मिलता प्याज,लहसुन,धनिया है 
दे दिए जख्म इतने 'घोटू'इस जमाने ने ,
जरा सी बात पर अब आँखें जाती पनिया है 

मदनमोहन बाहेती'घोटू'
आओ,कुछ इंसानियत दिखाए 

खुदा ने जब कायनात को बनाया 
तो उसे कुदरत के करिश्मो से सजाया  
नदियाएँ बहने लगी 
सबको मीठा जल देने लगी 
फिर वृक्ष बनाये 
उनमे मीठे मीठे फल लगाए 
हवाएं बहने लगी 
सबको ठंडक देने लगी 
पहाड़ो पर हरियाली छाई 
ग्रीष्म,शीत ,बारिश और बसंत ऋतू आई 
सूरज ने प्रकाश और ऊष्मा फैलाई 
चाँद ने रात में शीतलता बरसाई 
फूल महकने लगे 
पंछी चहकने लगे 
सबने ,जितना जो दे सकता था ,
खुले हाथों दिया 
और बदले में कुछ नहीं लिया 
और फिर जब भगवान ने इंसान को बनाया 
तो उसने प्रकृति की इन सारी नियामतों का ,
भरपूर फायदा उठाया 
और बदले में क्या दिया 
पेड़ों को कटवा दिया
पहाड़ों का किया दोहन 
 बिगाड़ दिया पर्यावरण 
स्वार्थ में होकर अँधा  
नदियों का पानी किया गंदा 
एक दुसरे से लड़ने लगा  
जमीन के लिए झगड़ने लगा  
धरम के नाम पर आपस में फूट डाल  ली 
कितनी ही बुराइयां पाल ली 
अब तो इस बैरभाव की इंतहा होने लगी है 
धरती भी परेशां होने लगी है 
अब समय आगया है कि हम कुछ सोचे,विचारे 
अपने आप को सँवारे 
अपने फायदे के लिए ,
दूसरों को ना करे बर्बाद 
इसलिए आप सब से है फ़रियाद 
हम इंसान है,थोड़ी इंसानियत फैलाएं 
भाईचारे से रहे ,एक दुसरे के काम आये 
तो आओ ,ऐसा कुछ करें ,
जिससे हमारी छवि सुधरे 
चलो हम किसी रोते  को हंसाये  
किसी भूखे को पेट भर खिलाये  
किसी बिछुड़े को मिलाते है 
किसी गिरते को उठाते है  
किसी प्यासे की प्यास मिटाये 
किसी दुखी का दर्द हटाए 
किसी असहाय को सहारा दे 
किसी डूबते को किनारा दे 
किसी बुजुर्ग के दुःख काटे 
किसी बीमार को दवा बांटे 
किसी को अन्धकार से उजाले में लाये 
किसी भटके को सही राह दिखलाये 
किसी अबला की इज्जत ,लूटने न  दे 
किसी बच्चे का ख्वाब टूटने न दे  
किसी अनपढ़ को चार लफ्ज सिखला दे 
किसी अंधे को रास्ता पार करा दे 
किसी के रास्ते से बुहार दे कांटे 
जितना भी हो सके,सबमे प्यार बांटे 
करे कोशिश कि कोई लाचार न हो 
कम से कम कुछ  ऐसा करे,
जिससे इंसानियत शर्मशार न हो 
मिलजुल कर भाईचारे से रहें,आपस में न लड़े 
ऐसा कुछ न करे जिसका खामियाजा ,
हमारी आनेवाली पीढ़ी को  भुगतना पड़े  
हर तरफ चैन और अमन रहे छाया 
जिससे ऊपरवाले को भी अफ़सोस न हो ,
कि उसने इंसान को क्यों बनाया?  

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

शनिवार, 29 जुलाई 2017

मटर पनीर 

मैं ,फटे हुए दूध सा ,
दबाया गया ,रसविहीन ,
टुकड़ों में काटा गया पनीर 
तुम ,हरी भरी,गठीली ,
गोलमोल मटर के दानो सी ,
मटरगश्ती करती हुई ,अधीर 
टमाटर की ग्रेवी की तरह ,
लिए हुवे लाली 
यौवन से भरी,मतवाली 
गृहस्थी की कढ़ाई में ,हमारा मिलन 
आपसी नोकझोंक वाली छौंक से ,
मसालेदार हुआ हमारा वैवाहिक जीवन 
आज सुखी है,आबाद है 
उसमे। मटर पनीर वाला स्वाद है 

घोटू 
घर या घरौंदा 

हमें याद आते है वो दिन 
जब जिंदगी के शुरुवाती सफर में 
रहा करते थे हम ,किराये के एक घर में 
तब मन में एक सपना होता था ,
कि कभी ऐसे दिन भी  आएंगे 
जब हम अपना खुदका एक घर बनाएंगे 
और उसे मन मुताबिक़ सजायेंगे 
सबका अपना अपना कमरा होगा 
पूरा घर रौनक से भरा होगा 
और पूरा करने अपना यही ख्वाब 
काम में जुटे रहे दिनरात 
और फिर एक दिन ऐसा भी आया 
जब हमने अपना घर बनाया 
पर तब तक बच्चे ,पढ़ाई के चक्कर में 
रहने लगे हॉस्टल में 
कभी कभी होली दिवाली आते थे 
खुशियों की महक फैलाते थे 
एक भरे पुरे घर का अहसास कराते थे 
और फिर कुछ दिनों में चले जाते थे 
फिर बेटी की शादी हो गयी 
वो अपने ससुराल चली गयी 
बेटों ने विदेशो में जॉब पा लिया 
और वहीँ पर अपना घरसंसार बसा लिया 
और हमारा बड़े अरमान से बनाया,आशियाना 
हो गया  वीराना 
अब उसमे मैं और मेरी पत्नी ,
जब अकेले में काट रहे अपना बुढ़ापा है 
हमें वो किरायेवाला मकान बहुत याद आता है 
जब उस छोटे से घर में ,
चहल पहल और रौनक रहती थी 
खुशियों की गंगा बहती थी 
तब किराये का ही सही ,
वो घर ,घर लगता था ,
और आज ,
जब खुद का इतना बड़ा बंगला है 
पर तन्हाई में लगता एक जंगला है 
जिसमे मैं और मेरी पत्नी ,
कैदी की तरह एक दुसरे की सुनते रहते है 
अपने बड़े अरमान से बुने हुए सपनो को ,
उधेड़ते और फिर से  बुनते रहते है 
हमारे दिल की तरह ,पूरा घर सूना पड़ा है 
कई बार लगता है ,
घर नहीं,एक घरौंदा खड़ा है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
चूना 

१ 
दीवारों पर लग कर मैं दीवारें सजाता हूँ 
लगता हूँ पान में तो होठों को रचाता हूँ 
कोशिशें करता हूँ जो उनको निखारने की,
उनको ये शिकायत है ,मैं चूना लगाता हूँ 
२ 
चूने की दीवारों पर ,जब चूना लगता है ,
तो उनकी रौनक फिर ,और भी निखरती है 
रूप कातिलाना है ,सुन्दर और सुहाना है,
लगती है जालिम जब,सजती  संवरती  है 
मोती सी झलकाती,दन्तलड़ी मुस्काती ,
देखने वालों पर,बिजलियाँ  गिरती है 
सोने सा अंग अंग,भर जाता नया रंग ,
जब थोड़ा अलसा वो ,अंगड़ाई भरती है 

घोटू 
सबकी नियति 

इतने अंडे देख रहे तुम,कोई कब तक मुस्काएगा 
नियति एक ,टूटना सबको,हर अंडा  तोडा जाएगा 
कोई यूं ही ,चोंटें खा खा ,करके चम्मच की टूटेगा 
उसे दूध में मिला कोई ,ताक़त पाने का ,सुख लूटेगा 
डूबा गरम गरम पानी में ,कोई अंडा ,जाए उबाला 
और तोड़ कर,उसे काट कर ,खाया जाए वो बेचारा 
कोई तोड़ कर ,फेंटा जाता ,गरम तवे पर जब बिछ जाता 
तो प्यारा सा ,आमलेट बन,ब्रेकफास्ट में ,खाया जाता 
कुछ किस्मतवाले ,तोड़े भी जाते ,फेंटे भी जाते  है 
मैदे में मिल, ओवन में पक ,रूप केक का वो पाते है 
उन्हें क्रीम से ,सजा धजा कर ,सुन्दर रूप दिया जाता है 
मगर किसी के ,जन्म दिवस पर ,उसको भी काटा जाता है 
टुकड़े टुकड़े खाया जाता ,मुंह पर कभी मल दिया जाता 
किसी सुंदरी ,के गालों का ,पा स्पर्श,बहुत इतराता 
सबकी अपनी अपनी किस्मत,मगर टूटना सबको पड़ता 
कोई ओवन,कोई तवे पर ,और पानी में कोई उबलता 
चाहे अंडा हो या इंसां , होती सबकी ,एक गति है  
सबका है क्षणभंगुर जीवन,और एक सबकी नियति है  

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
मेरी आँखें 

पता नहीं क्यों,बहुत ख़ुशी में ,पनिया जाती,मेरी आँखें 
भावों से विव्हल हो,आंसूं,,भर भर लाती,मेरी आँखें 

दुःख में तो सबकी ही आँखें,बिसुर बिसुर  रोया करती है 
अपना कोई बिछड़ता है तो ,निज धीरज खोया करती है 
खिले कमल सी सुख में ,दुःख में ,मुरझा जाती मेरी आँखें 
पता नहीं क्यों ,बहुत ख़ुशी में ,पनिया जाती ,मेरी आँखें 

कभी चमकती है चंदा सी,और लग जाता कभी ग्रहण है 
रहती है ,खोई खोई सी,जब कोई से ,मिलता मन है 
हो आनंद विभोर ,मिलन में ,मुंद मुंद  जाती,मेरी आँखें 
पता नहीं क्यों,बहुत  ख़ुशी में ,पनिया जाती,मेरी आँखें 

जब आपस में टकराती है ,तो ये प्यार किया करती है 
छा जाता है ,रंग गुलाबी ,जब अभिसार किया करती है 
झुक जाती ,जब हाँ कहने में ,है शरमाती ,मेरी आँखें 
पता नहीं क्यों ,बहुत ख़ुशी में ,पनिया जाती,मेरी आँखें 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
बूढ़ों के जज्बात 

क्या बूढ़ों के मन में कुछ जज्बात नहीं रहते 

ये सच है कि साथ समय के ,ढल जाता तन है 
पर वो ही आशिक़ मिजाज सा रहता ये मन है 
भले जवानी के दिन वाला    जोश नहीं रहता  
लेकिन फिर भी देख हुस्न को होश नहीं रहता 
मन रंगीन ,उमंगों से भर ,मचला करता  है 
जलवा अब भी हमें हुस्न का ,पगला करता है 
लेकिन कुछ कर सकने के ,हालात नहीं रहते 
क्या बूढ़ों के मन में कुछ जज्बात नहीं रहते 

हाँ,थोड़ी कम हो जाती पर भूख तो लगती है 
आँखें अब भी ,हुस्न दिखे,चोरी से तकती  है 
ये सच है कि ना रहता यौवन का जलवा  है 
साथ समय के ,सिक कर इंसां ,बनता हलवा है 
पर कोई ना चखता ,मन को बात सालती  है 
बुढ़ियायें तक भी न हमें पर घास डालती है 
वो रंगीन मिजाजी के दिन रात नहीं रहते  
क्या बूढ़ों के मन में कुछ जज्बात नहीं रहते 

सर पर अगर सफेदी छाये ,तो क्या होता है 
आँख अगर धुंधली हो जाए ,तो क्या होता है 
भले नहीं तन का मिजाज अब पहले जैसा है 
पर दिल की रंगीनी तो रंगीन हमेशा   है 
देख हुस्न को अब भी यह मन उछला करता है
लेकिन अंकलजी कहलाना ,पगला करता  है 
अच्छे दिन भी ,ज्यादा दिन तक साथ नहीं रहते 
क्या बूढ़ों के मन में कुछ जज्बात नहीं रहते 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

क्या ये उमर का असर है 

मुझे याद आते है वो दिन 
जब कभी कभी तुम 
होटल में खाने की करती थी फरमाइश 
और मेरे बजट में ,नहीं होती थी गुंजाईश 
तो मैं कुछ न कुछ बहाना बना 
कर देता था मना 
क्योंकि उस एक दिन की आउटिंग में ,
मेरा महीने भर का बजट हो जाता बर्बाद 
और हम लौकी की सब्जी में ही ,
ढूँढा करते थे ,मटर पनीर का स्वाद 
और आज जब मैं इतना सम्पन्न हूँ 
कि तुम्हे हर रोज ,
पांच सितारा होटल में करा सकता हूँ भोज 
जब तुम्हे बाहर खाने को करता हूँ ऑफर 
तो तुम देख कर अपना मोटा होता हुआ फिगर 
या फिर डाइबिटीज से डर ,
बाहर खाने के लिए  मना कर देती हो 
और खाने में ,लौकी की सब्जी ,
बना कर देती हो 
वो ही लौकी तब भी थी ,
और वो ही लौकी अब है 
पर उनको खाने की वजहें अलग है 
दोनों में कितना अंतर् है 
क्या ये उमर का असर है?
मुझे याद आते है वो दिन ,
जब मैं देख कर कोई औरत हसीन 
अगर गलती से उसकी खूबसूरती की ,
तारीफ़ कर देता था जो एक भी दफा 
तुम जल भुन  कर हो जाती थी खफा
बुरी तरह रूठ जाया करती थी 
दो दिन तक बात नहीं करती थी 
और आज मैं अगर किसी औरत की 
खूबसूरती की तारीफ़ देता हूँ  कर
तुम कह देती हो मुस्करा कर 
जाओ,चले जाओ उसीके पास 
कोई भी तुम्हे नहीं डालेगी घास 
घूम फिर कर फिर मेरे पास ही आना होगा 
मैं जैसी भी हूँ,उसी से काम चलाना होगा 
तुम भी वो ही हो ,मैं भी वही हूँ,
पर नज़रिये में आ गया कितना अंतर है 
क्या ये उमर का असर है?
मुझे याद आते है वो दिन ,
जब मैं कभी तुमसे प्यार की मनुहार करता था ,
तुम नज़रें झुका ,ना ना कहती थी 
और फिर चुपचाप,यमुना की तरह ,
मेरी गंगा में मिल कर ,साथ साथ बहती थी 
और आज ,जब मै कभी कभी ,
करता हूँ प्यार की पहल 
तुम लेती हो करवट बदल 
तुम्हारे व्यवहार में आगयी इतनी प्रतिकूलता है 
चुंबन लेने में भी ,तुम्हारा सांस फूलता है 
आज भी मेरे प्यार के आव्हान पर ,
तुम्हारा उत्तर ना ना होता है 
कभी कमर दर्द तो कभी सर दर्द का,
बहाना होता है 
तुम्हारी तबकी ना ना में ,
और अब की ना ना में ,आ गया कितना अंतर् है 
क्या ये उमर का असर है?

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

सबकी नियति
 
 ट्रे में सजे धजे सब अंडे,कोई कब तक मुस्काएगा 
सबकी नियति एक ,एक दिन ,हर अंडा तोडा जाएगा 
कोई चोंटें खा खाकर के ,यूं ही  चम्मच की टूटेगा 
मिला दूध में ,पी कर कोई ,ताक़त पा कर ,सुख लूटेगा 
कोई गरम गरम पानी में ,डुबो डुबो कर जाय उबाला 
और तोड़ फिर काटा जाता ,फिर खाया जाता ,बेचारा 
कोई तोड़ कर फेंटा जाता ,गरम तवे पर  जाय बिछाया 
और प्यारा सा आमलेट बन ,ब्रेकफास्ट में जाए खाया 
कुछ किस्मतवाले अंडे है ,जो तोड़े और फेंटे जाते 
मैदे में मिल,ओवन में पक,रूप केक का है वो पाते 
उन्हें क्रीम से सजा धजा कर ,सुन्दर रूप दिया जाता है 
मगर किसी के जन्मदिवस पर ,उसको भी काटा जाता है 
टुकड़े टुकड़े खाया जाता ,मुंह पर कभी मल दिया जाता  
किसी सुन्दरी के गालों का ,पा स्पर्श ,बहुत इतराता 
सबकी अपनी अपनी किस्मत ,मगर टूटना सबको पड़ता 
कोई ओवन,कोई तवे पर ,और पानी में कोई उबलता 
चाहे अंडा हो या मानव ,तपते,पकते रहते हर क्षण 
सबकी नियति एक है मगर,क्षण भंगुर सबका है जीवन 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
रिमझिम और बाढ़ 

रिमझिम बरसती बूँदें,लगती है बड़ी सुहानी 
लेकिन जब उग्र हो जाता है है ,वो ही पानी 
और उसके सर पर ,जब खून चढ़ जाता है 
तो वो मटमैला होकर ,बाढ़ का कहर ढाता है 
ऐसी ही रिमझिम जैसा होता है पत्नी का प्यार 
और गुस्सा,सहनशक्ति का बाँध तोड़ती ,बाढ़ 

घोटू 

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

 ये हाथ तुम्हारे 

ये हाथ तुम्हारे सुन्दर है ,कोमल है नरम मुलायम है 
फिर भी दिनभर सब काम करे,इन हाथों में इतना दम है 
इन हाथों का स्पर्श मात्र ,मुझको रोमांचित कर देता 
हाथो में हाथ लिए चलना ,जीवन में खुशियां भर देता 
ये हाथ मुझे जब सहलाते ,मुझको सिहरन सी लगती है 
ये हाथ बहुत प्यारे लगते ,जब इन पर मेंहदी सजती  है 
इन हाथों की रेखाओं में, है छुपी हुई  जीवन गाथा 
इन हाथों का जब साथ मिले ,सुख से जीवनपथ कट जाता 
इन हाथों की उंगली में ही ,जब एक अंगूठी पहनाते 
तो जीवन भर के बंधन में ,दो अनजाने भी बंध जाते 
इन हाथों में पहने कंगन ,जब खनका करते रातों में 
एक चिंगारी सी लग जाती,मन के सोये जज्बातों में 
इन हाथों की एक उंगली ही ,जब करती एक इशारा है 
तो बेबस हो नाचा करता ,हर एक पति बेचारा  है
इन हाथों द्वारा बना हुआ ,स्वादिष्ट बहुत लगता भोजन 
तारीफ़ करू,इनको चूमूँ ,ऐसा करता है मेरा मन 
ये हाथ सहारा देते है ,मुश्किल बिगड़े  हालातों में 
मैंने जीवन का सौंप दिया ,सब भार बस इन्ही हाथों में 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
खैर मना बददुआ नहीं दी 

तूने मुझे दुखी करने में ,छोड़ी कोई कसर नहीं थी 
मैने तुझको दुआ नहीं दी,खैर मना बददुआ नहीं दी 

ग्रहण काल में उगता सूरज ,पड़ा ग्रहों पर मेरे भारी 
तहस नहस घरबार हो गया ,ऐसी भड़की थी चिंगारी 
कोई को कुछ नहीं समझती ,इतना तुझमे चढ़ा अहम था 
सबसे समझदार तू जग में ,तेरे मन में  यही बहम था 
तेरी एक एक हरकत में ,नज़र छिछोरापन आता था 
पराकाष्ठा निचलेपन की ,काम तेरा हर दिखलाता था 
तेरे जैसी आत्मकेन्दित , देखी  मैंने  कहीं  नहीं थी 
मैंने तुझको दुआ नहीं दी,खैर मना बददुआ नहीं दी
 
मैंने  सोचा साथ समय के ,सोच तुम्हारी सुधर जायेगी 
आज नहीं तो शायद कल तक तुममे थोड़ी अकल आएगी 
इतनी कटुता और कुटिलता ,तेरे मन में भरी हुई है 
रिश्ते नाते अपनेपन की ,सभी भावना मरी हुई है 
चेहरे पर मुस्कान ओढ़ कर बातें करती ओछी ओछी 
हम भोले थे समझ न पाये ,तेरी चालें ,समझी ,सोची 
पल पल पीड़ा और वेदना ,आंसू पिये और सही थी 
मैंने तुझको दुआ नहीं दी ,खैर मना बददुआ नहीं दी 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सोमवार, 17 जुलाई 2017

चूक 

जिंदगी की राह में ,सुख भी मिले ,दुःख भी मिले,
कहीं पर राधा मिली तो कहीं पर रुक्मण मिली 
बालपन का प्यार निश्छल ,भुलाना मुझको पड़ा ,
उम्र भर जो नहीं सुलझी ,ऐसी एक उलझन मिली 
मूक है वो  बांसुरी अब. बिसुरती ,चुपचाप है ,
कभी जिसकी एक धुन पर ,नाचती थी गोपियाँ 
बांसुरी के छिद्र पर थिरके,सुरीली तान दे,
नहीं फुरसत ,व्यस्त है अब सुदर्शन में उँगलियाँ 
भुला दी वो कुञ्ज गलियां ,यमुना की कल कल मधुर ,
द्वारका के समंदर की ,बस गयी मन में  लहर 
द्वारका का धीश बन कर ,कन्हैया को क्या मिला ,
भूल यमुना का मधुर जल,पाया खारा समन्दर 
जिंदगी भर रही मन में ,यही पीड़ा सालती ,
कौन सा मुंह ले मिलूंगा ,यशोदा,नंदलाल से 
प्रेम राधा का भुलाया ,सखाओं की मित्रता,
भूल ऐसी किस तरह से ,हो गयी  गोपाल से 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी या अनुगामिनी 

जब औरतों के सर पर 
चढ़ जाता है मर्दों से बराबरी का चक्कर 
और वो उन्हें देना चाहती है टक्कर 
तो वो क्या खो रही है ,
उन्हें इसका अहसास नहीं होता है 
क्योंकि जब पति पास होता है 
तो मन में एक आत्मविश्वास होता है 
कोई शोहदों को पास फटकने नहीं देता 
सही सलामत मंजिल तक पहुंचाता है ,
भटकने नहीं देता 
साथ का सारा बोझा खुद उठाता है 
कहता है ये नाजुक लोगों का काम नहीं ,
इसे मर्दों का काम बतलाता है 
दुःख और परेशानी में ,
उसकी मजबूत बाहों का सहारा होता है
वो सच्चा मित्र और हमसफ़र प्यारा होता है 
उसके बलिष्ठ सीने से लग कर औरत ,
अपने आप को महफूज महसूस करती है 
कोई उसके साथ है इसलिए नहीं डरती है 
रोज मेहनत कर,कमा कर लाता है 
घर परिवार का  खर्चा चलाता है 
बच्चों का पालनपोषण और प्यार देता है 
उन्हें अनुशासन में रख ,अच्छे संस्कार देता है 
उसका साथ,एक सबसे बड़ी उपलब्धि है औरत की 
क्योकि वो ,एक जीती जागती मूरत है,
त्याग और मोहब्बत की 
परिवार की ख़ुशी होती उसकी प्राथमिकता है 
उसी के लिए वो दिनभर काम में पिसता है 
छुट्टी के दिन जब वो घर पर रहता है ,
घर में रौनक छाई  रहती है  
पूरे परिवार में ख़ुशी की बहार आयी रहती है 
जब वो आपका सच्चा साथी बन कर ,
निभाता अपना सब फर्ज है 
तो फिर महिलाओं को ,
उसकी अनुगामिनी बन कर रहने में क्या हर्ज है 
जो औरते बराबरी की बात करती है 
वो स्वयं पर कुठाराघात करती है 
क्योकि पति ने उन्हें बराबर का ही नहीं ,
अपने से बहुत ऊंचा दर्जा दिया हुआ है 
अपना सब कुछ उन्हें अर्पित किया हुआ होता है 
उन्हें  गृहलक्ष्मी मन उसकी पूजा करता है 
उन्हें कोई बात बुरी न लगे,डरता है 
उमके इशारों पर नाचता रहता है 
अपनी परेशानी ,हंसी में टालता रहता है 
वो नहीं होता तो घरमे सूनापन बिखरता है 
न खाना बनाने में मन लगता है ,
न सजने संवरने में मन लगता है 
जो औरतें अपने अहम में 
बराबरी की टक्कर के बहम में 
अपने को पुरुष से ऊंचा बतलाती है 
पुरुष का साथ नहीं  पाती है 
वो इन सारे खूबसूरत अहसासो से ,
वंचित रह जाती है 
जीवन में कितना कुछ खोती है 
कोई उनके अंतर्मन से पूछे,,
अकेले में कितनी दुखी होती है 
इसलिए मर्दों से मुकाबला न कर के ,
अपने को उनसे एक दर्जा नीचा ही दिखलाओ 
और जीवन के सारे सुखों का मज़ा उठाओ 
क्योकि इस समर्पण से ,
नीची नहीं होती आपकी नाक है 
यह स्वाभिमान से समझौता नहीं,
दिलों का रिश्ता है ,जो बड़ा पाक है 
आदमी को जब तक आप ये महसूस कराती हो ,
कि आपको उसकी जरूरत है ,
वो आगे बढ़ कर आपको सहारा देता है 
और जब आप अपने आप को श्रेष्ठ बताने का ,
प्रयास करती है तो वो हाथ खेंच लेता है 
इसीलिये प्यारी महिलाओं 
अपनी श्रेष्टता को वरिष्टत्ता मत बनाओ 
स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्वामिनी न बन कर ,
पति की अनुगामिनी बन जाओ 
और जीवन का मज़ा उठाओ 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
चाँद तुझे मैं समझ न पाया 

चाँद तुझे मैं समझ न पाया कि तू क्या है 
रात रात भर जागा करता 
खिड़की खिड़की झांका करता 
पंद्रह दिन तक बढ़ता जाता 
पंद्रह दिन तक घटता जाता 
और एक दिन पूरा ही गायब हो जाता 
ये सब तेरा चक्कर क्या है 
चाँद तुझे मैं समझ न पाया कि तू क्या है 
तुझको कैसा जादू आता 
कैसे जोड़ लिया करता है  
सबसे ही तू अपना नाता 
माताये अपने बच्चों को ,
चंदा जैसा  प्यारा कहती 
अपना राजदुलारा कहती 
और बच्चे तुझको कहते है चंदा मामा 
ये मामा बनने का चक्कर ,
क्यों,कैसा है ,ये बतलाना 
क्यों सुहाग के सब पर्वों के,
 साथ तुझे जोड़ा जाता है  
पति की लम्बी उमर वास्ते ,
करवा चौथ औरते करती ,
और चलनी से तुझे देख कर ,
ही यह व्रत तोडा जाता है 
कोई प्रेमिका अपने प्रेमी ,
को तुझ जैसा बतलाती है 
इसीलिये 'तू मेरा चाँद ,
मैं तेरी चांदनी वो गाती है 
कोई प्रेमी परेशान हो ,
तुझको खुद सा बतलाता है 
इसीलिए गाना गाता है 
चंदा ओ चंदा ,किसने चुराई ,
तेरी मेरी निंदिया ,
जागे सारी रैना,तेरे मेरे नैना 
आसमान में घूमा करता तू आवारा 
 इससे  कितनी ही विरहन का ,
बन जाता तू एक सहारा 
तेरे साथ संदेशा चाहती वो भिजवाना 
गाकर गाना 
ऐ चाँद जहाँ वो जाए ,तू उनके साथ जाना 
हर रात खबर लाना 
प्रेमी अपनी प्रियतमा का ,
तुझमे अक्स ढूंढने जाते 
इसीलिए वो मेहबूबा मुख,
चाँद चौदहवी का बतलाते 
और सुहाग रातों में अक्सर 
पत्नी के गोर मुखड़े को ,
तुझसे करते है कम्पेयर 
भावुक होकर गाया करते है मस्ती में 
एक रात में दो दो चाँद खिले ,
एक घूंघट में ,एक बदली में 
इंग्लिश में भी पहली नाईट ,
,प्रथम मिलन की ,
तेरे संग है जोड़ी जाती 
जब दोनों प्रेमी मिलते है ,
हनीमून है वो कहलाती  
कोई प्रेमिका जब शरमाती 
क्योकि देख रहा होता तू,
प्यार ,मिलन में वो घबराती 
इसीलिये वो गाना जाती 
बदली में छुप जा रे 
ओ  चंदा ,प्यारे 
मैं उनसे प्यार कर लूंगी 
बातें हज़ार कर लूंगी 
सुनते है कि तू सूरज से ,
लेता है उधार रौशनी 
और सबमे बांटा करता है ,
शीतल उसको बना चांदनी 
दिल का तू कितना अमीर है 
तू सचमुच में दानवीर है 
ऐसा तुझमे क्या आकर्षण 
कि सागर की सारी लहरे ,
तुझसे मिलने उछला करती 
तू जब होता है शबाब पर ,
और जिस दिन होती है पूनम 
ऐसा जाने क्या है तुझमे ,
तेरा रुदबा बढ़ा हुआ है 
इसीलिये तो तू शिवजी के ,
मस्तक भी चढ़ा हुआ है 
एक बात और समझ के बाहर 
किसी काम के लिए
 सभी से मांग मांग कर 
पैसा लोग इकठ्ठा जो करते रहते है 
उसको 'चन्दा'क्यों कहते है 
तेरी सब बाते अलबेली 
अभी तलक पहचान न पाया ,
चंदा तू अनबूझ पहेली 
हर दिन तेरा रूप नया है 
चाँद,तुझे मैं समझ न पाया कि तू क्या है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 12 जुलाई 2017

बीते हुए दिन

उन दिनों सीनियर सिटिज़न फोरम की
 मीटिंग की तरह ,
लगा करती थी एक चौपाल  
सब पूछते थे ,एक दूसरे का हाल 
मिल बैठ कर ,हँसते गाते थे 
एक दूसरे के सुख दुःख में काम आते थे 
न कोई पॉलिटिक्स था ,न अहम का टकराव था 
न कोई दुराव था ,न कोई छिपाव था 
आपस में प्रेम था ,लगाव था 
व्हाट्स एप ग्रुप की तरह ,
एक हुक्का होता था ,जिसे सब गुड़गुड़ाते थे 
सब बराबर का मज़ा उठाते थे 
न कोई छोटा था न कोई बड़ा था 
न कोई एडमिन बनने का झगड़ा था 
जिसके मन में जो आता था,,कह लेता था 
किसी को बुरा लगता ,तो सह लेता था 
हंसी ख़ुशी  मेलजोल की आदत थी 
बदले की भावनाएं नदारद थी 
आज हम भूल वो ख़ुशी के पल गए है 
क्या हमें नहीं लगता की हम बदल गए है 
आज हम जो जी रहे है ,बोनस में मिली जिंदगी 
क्यों न इसे गुजार दे ,हंसी ख़ुशी करके दिल्ल्गी 
जिसके मन में जो आये,कहने दो 
व्हाट्स एप पर जो संदेशे आते है,आते रहने दो 
क्या पढ़ना ,क्या न पढ़ना ,ये आपकी  चॉइस है 
आपसी मतभेद मिटाने की काफी गुंजाईश है 
जैसा चल रहा था ,वैसा चलने दो 
ये आपका लगाया पौधा है,
इसे फूलने फलने दो 
भुला दो कौन है एडमिन और कौन होगा एडमिन 
प्लीज् ,लौटा दो ,वो ही बीते हुए दिन 

घोटू 

सोमवार, 10 जुलाई 2017

खुल जा सिम सिम 

१ 
अलीबाबा और चोर का ,किस्सा कर लो याद 
एक खजाना लग गया ,अलीबाबा के  हाथ 
अलीबाबा के हाथ ,हुई थी धन की रिमझिम 
खुले खजाना ,जब वो कहता ,खुल जा सिम सिम 
कह घोटू कवि ,भरे हुए थे ,हीरा,मोती 
वो ले आता लाद ,उसे जब जरूरत होती 
२ 
वैसे ही एक खजाना ,पास हमारे आज 
सिम सिम याने डबल सिम ,छुपा इसी में राज 
छुपा इसीमे राज ,खजाना है मोबाइल 
और इस सिम सिम से लूटो जितना चाहे दिल 
दुनिया भर का ज्ञान,सूचना सब मिल जाते  
अपनों से दिन रात करो, जी भर कर बातें 

घोटू 
मज़ा उठालो जीवन के हर पल का


जब होता है समय ,हमें ना मिलती फुरसत ,
जब होती है फुरसत ,बचता समय नहीं है 
इसीलिए हम इस जीवन के एक एक पल का,
पूर्ण रूप से मज़ा उठाले, यही सही  है 
जब तक दूध पड़ा था ताज़ा ,पी ना पाए,
वक़्त गुजरने पर फट जाता या जम जाता 
फटे दूध को तुम पनीर कह मन बहला लो ,
जमे दूध में ,कभी दही सा स्वाद न आता 
मित्रों ,समय हुआ करता है एक पतंग सा ,
जरा ढील दी ,छूटा ,हाथ नहीं आता है 
गयी हाथ से निकल डोर और पतंग उड़ गयी ,
साथ पतंग से मांजा भी सब उड़ जाता है 
जब तक तन में शक्ति थी तुम जुटे काम में,
रत्ती भर भी मज़ा उठाया ना जीवन का 
अब जब थोड़ा वक़्त मिला तो बची न शक्ति ,
ढीला ढाला पड़ा हुआ हर पुर्जा तन का 
हरे  आम होते  है  खट्टे  और सख्त भी,
पक जाने पर ,हरे आम ,पीले पड़ जाते 
सही समय पर उसका मीठा स्वाद उठालो,
अगर देर की ,तो फिर आम सभी सड़ जाते 
जब हो लोहा गरम चोंट तुम तब ही मारो ,
ठन्डे लोहे पर होता कुछ असर नहीं है 
इसीलिये हम इस जीवन के एक एक पल का 
,पूर्ण रूप से मज़ा उठाले,यही सही है 
 
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
ऐसा भी होता है 

एक कोने में पलंग के ,हम रहते मजबूर 
उस कोने में पलंग के ,पत्नी सोती दूर 
पत्नी सोती दूर ,नींद ना आती ढंग से 
एक रात करवट बदली,वो गिरी पलंग से
तबसे मुझसे लिपटी चिपटी वो सोवे है  
हर मुश्किल का अंत सदा अच्छा होवे है 

घोटू 
वो पुराना जमाना 

आज जब जीवन,
 बड़ी तेजी से बदलता जा रहा है 
हमें रह रह कर ,
वो पुराना जमाना याद आ रहा है 
तब जब न सर्फ़ था ,न एरियल था ,न टाइड था 
बस सिर्फ  एक साबुन सनलाइट  था ,
जिससे  घर भर के सारे कपडे धुला करते थे 
और कुछ लोग उससे नहा भी लिया करते थे 
वैसे नहाने के लिए ,लाइफबॉय की लाल बट्टी 
आया करती थी काम 
या फिर कुछ लोग काम में लेते थे जय और हमाम 
वैसे उन दिनों  लक्स साबुन भी पॉपुलर था ,
जिसे विज्ञापन सिने तारिकाओं के सौंदर्य का 
रहस्य बतलाते थे 
भले ही उससे डेविड,शेट्टी और ओमपूरी भी नहाते थे 
बचे हुए साबुन की चीपटों से ,
शौच के बाद हाथ साफ़ किये जाते थे 
वैसे इस काम के लिए ,मिट्टी और राख  ,
काम में लिए जाते थे 
औरते,काली मिटटी और दही मिला कर ,
सर के बालों को धोने के लिए काम में लाती थी 
और मेकअप के लिए अफगान स्नो लगाती थी 
न तरह तरह के शेम्पू होते थे ,न कंडीशनर थे 
सिर्फ ब्राह्मी आंवला तेल ,लगाते सर पर थे 
न परफ्यूम थी या सेंट या डियो थे 
लोग कान में रखते इत्र के फुहे थे 
उन दिनों कूलर और ए सी नहीं होते थे 
रात को लोग ,खुली छतों पर सोते थे 
गर्मी में हाथ से पंखा डुलाते थे 
और गर्मी से निजात पाते थे
 मटके और सुराही का पानी पीते थे 
और खुश होकर जीवन जीते थे 
न कोकोकोला था ,न पेप्सी थी ,
न थम्सअप का जोश था 
फिर भी सबके मन में संतोष था 
थोड़ी सी पगार और बहुत बड़ा परिवार 
फिर भी ख़ुशी ख़ुशी लेते थे जीवन गुजार 
छोटा भाई,बड़े भाई के छोटे हुए कपडे पहनता था 
टीवी के सीरियल नहीं थे ,
दादी,नानी की कहानियों से मन बहलता था 
रोज दाल रोटी खाते थे ,
बस कभी कभी ही पकवान छनते  थे 
त्योंहारों पर ही ,
पूरी और पूवे बनते थे  
पिज़्ज़ा,पास्ता या बर्गर 
या फिर दो मिनिट में बनने वाले नूडल 
लोग इन सबके नाम से भी अनजान थे 
सीधीसादी  जिंदगी थी,भोले भाले  इंसान थे 
पर जबसे इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने डेरा डाला है 
नई नई ब्रांडों के चक्कर ने ,
सारा बजट ही बिगाड़ डाला है 
हर काम के लिए ,अलग अलग प्रोडक्ट ,
और अलग अलग ब्रांड आ गए है 
विज्ञापन के बल पर लोगों के ,
दिलो दिमाग पर छा गए है 
ब्रांडेड चीजों का उपयोग ,
एक स्टेटस सिम्बल बन गया है 
सब लोग खोजते है,क्या नया है 
इसी चक्कर में चीजों  के दाम,
 आसमान पर चढ़ गए है 
 खरचे  बेहताशा बढ़ गए है 
 मंहगी वस्तुए ,लोगो की पसंद हो  गयी है 
और जबसे ये माल खुल गए है,
छोटी दुकाने बंद हो गयी है 
चार आने वाली चाट ,बड़े बड़े रेस्टारेंट में 
चालीस रूपये की मिलती है 
और फिर भी खरीदने के लिए
 लोगों की लाइन लगती है 
देखिये ,कैसे दिन आ रहे है 
लोग जेब कटवा कर भी मुस्करा रहे है 
जीवनशैली का ये परिवर्तन ,
हमे कहाँ से कहाँ ले जा रहा है 
मुझे आज फिर वो पुराना जमाना याद आरहा है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

टॉवर एक की रंगीन किट्टी 
१ 
किट्टी टावर एक की ,करती है इम्प्रेस 
थीम रखी सबआएँगी ,पहन कलरफुल ड्रेस 
पहन कलरफुल ड्रेस ,रंग जो ज्यादा लावे
 प्राइस की हक़दार वही महिला कहलावे 
कह घोटू कविराय ,खेल कुछ ऐसा खेला 
होटल में लग गया ,कई रंगों का मेला 
२ 
वैसे ही सब सुंदरी ,एक से बढ़ कर एक 
आयी बन कर कलरफुल पहने रंग अनेक 
पहने रंग अनेक ,लगी जब वे सब सजने 
चूड़ी,कुर्ती पहन ,लिपस्टिक से लब रंगने 
घोटू बोले ,हाथों में  मेंहदी  रचवालो 
और शरमा कर,गाल गुलाबी ,निज कर डालो 
३ 
घोटू पत्नी ने लगा ,रंगों का अम्बार 
कहा आत्मविश्वास से,जीतूंगी इस बार 
जीतूंगी इस बार ,देख कर अटल इरादा 
पत्नी के उन्नीस रंग थे सबसे ज्यादा 
रंग बीसवां था रंगीन मिजाजी वाला 
और इक्कीसवाँ रंग ,चढ़ा प्रीतम का प्यारा 

घोटू 

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

नदिया  यूं बोली सागर से 

तुम्हारा विशाल वक्षस्थल ,देख उछलती लहरें मन में 
इतनी थी मैं हुई बावरी, दौड़ी  आयी तुमसे मिलने 
तुम्हारा पहला चुम्बन जब ,लगा मुझे कुछ खारा खारा 
मैंने सोचा ,हो जाओगे ,मीठे हो जब मिलन  हमारा  
अपना सब मीठापन लेकर ,रोज आई  मैं पास तुम्हारे 
लेकिन तुम बिलकुल ना बदले ,रहे वही  खारे  के खारे  
तुमने तप कर ,बादल बन कर ,उड़ा दिया मीठापन सारा 
जन और जगती के जीवन हित ,देखा जब ये त्याग तुम्हारा 
तमने अपना स्वार्थ न देखा ,किया समर्पित अपना जीवन  
देख परोपकारी अंतर्मन ,भूल गयी मैं सब  खारापन 
इसीलिए बस दौड़ी दौड़ी ,तुमसे मिलने भाग रही हूँ 
पूर्ण रूप से ,तुम्हे समर्पित , निज मीठापन  त्याग रही हूँ 

घोटू 
सुख दुःख बाँटें 

नहीं हमको सिर्फ मीठा सुहाता ,सिर्फ हम नमकीन  खा  सकते नहीं 
मीठे और नमकीन का जब मेल हो,मज़ा आता खाने का ,तब ही सही 
वैसे जीवन में किसी को सुख सिरफ ,और किसी को दुःख सिरफ मिलते रहे 
रहे कोई मुश्किलों से जूझता ,फूल खुशियों के कहीं खिलते रहें 
अपने सुख ,दुःख और समस्याएं सभी ,मीठे और नमकीन सी हम बाँटले 
मुश्किलों के सारे दिन काट जायेंगें , जिंदगी का मज़ा मिल कर साथ  लें 

घोटू  
खारा समंदर कर दिया 

नदियों ने तो मीठा जल ही ,समंदर में भरा था,
उसका मीठापन सभी पर गुम हुआ जाने कहाँ 
कभी मंथन करने पर जो ,उगला करता रत्न था ,
बात ऐसी क्या हुई अब पहले जैसा ना  रहा 
हंस के मिल के ,संग रहती ,सब की सब जो मछलियां ,
हुई एक दूजे की दुश्मन ,भय था अंदर भर दिया 
इस तरह से अहम जागा ,मित्रता गायब हुई  ,
आपसी टकराव ने ,खारा समंदर  कर दिया 

घोटू 

रविवार, 2 जुलाई 2017

दामाद का दर्द 

अपनी पत्नी से परेशान 
एक शादीशुदा  नौजवान 
जब अपनी पत्नी की ज्यादतियों को,
झेल नहीं पाया 
तो अपने ससुर के पास जाकर,
अपना दुखड़ा  रोते हुये  गिड़गिड़ाया 
ससुरजी ,आपने भी बनाया है क्या आइटम 
जो मेरा ही सर खाती  रहती है हरदम 
छोटी छोटी बात पर झगड़ती रहती है 
मेरे माबाप से लड़ती रहती है 
घर को परेशानियों से भर दिया है 
मेरा जीना दूभर कर दिया है 
हो गया मेरा बड़ा गर्क है 
मेरा जीवन बन गया नर्क है 
आप प्लीज ,अपनी बेटी को समझाओ ,
और दे दो थोड़ा ज्ञान 
मुझे चैन से जीने दे ,ना करे परेशान 
जमाई की बात सुन कर ,
ससुरजी सेंटीमेंटल होने लगे 
और दामाद के आगे ,
अपना दुखड़ा रोने लगे 
बोले बेटा ,मै तेरा दर्द समझ सकता हूँ 
क्योंकि मै भी इसी पीड़ा में जलता हूँ 
मुझे तेरी पीड़ाओं का ज्ञान है 
क्योंकि जिस कपडे के टुकड़े तू परेशान है 
पिछले कई वर्षों से मेरे पास ,
उस कपडे का पूरे का पूरा थान है 
अब जैसे भी है,काम चलाले 
जैसे मैंने निभाई  है ,तू भी निभाले 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
बुढ़ापे की एक शाम ,ऐसे भी कट जाती है 

दो वरिष्ठ वृद्धजन ,
अपनी तन्हाई की शामे ,
इस तरह बिताते है 
शहर की व्यस्त सड़क पर ,
फैशन गारमेंट की दूकान के सामने,
सीढ़ियों पर बैठ कर ,
इधर उधर नज़रें घुमाते है 
और घंटो बतियाते है 
उनका यह अड्डा और ये दिनचर्या ,
यार दोस्तों में चर्चा का विषय बन गया है 
आखिर  एक दिन हमने पूछ ही लिया ,
रोज घंटो करते ,इतनी बातें होती ही क्या है 
उनमे से एक मुस्कराया और बोला 
यार हम तो वहां बैठ कर,नज़रें सेकते है 
आती जाती हुई महिलाओं को देखते है 
अगर महिला जवान हुई ,
तो उसके रूप की चर्चा करते है 
और उसकी हुलिया और चालढाल ,
फिल्म की किस हीरोइन से मिलती जुलती है ,
यही सोचा करते है 
अगर वो महिला,प्रोढ़ा या ढलती उमर की हुई,
तो गौर से निहारते है उसकी हालत 
और खंडहर को देख कर ,
ये अंदाज लगाने की कोशिश करते है  
कि अपने पूर्ण वैभव के दिनों में,
कितनी बुलंद रही  होगी वह इमारत 
और अगर वो बढ़ती हुई उमर की ,
कमसिन किशोरी हुई तो कयास लगाते है ,
कि बड़ी होकर वो कैसी नज़र आएगी 
अपने हुस्न के जादू से कितनो पर सितम ढायेगी 
यही नहीं ,दूकान में और भी ,
कितनी ही जोड़ियां आती जाती है 
उनकी गतिविधियां ,
उनके पारिवारिक जीवन के बारे में ,
काफी कुछ बतलाती है 
पति पत्नी की जोड़ी  दूकान के अंदर ,
साथ साथ तो जाती है 
पर थोड़ी देर बाद पति,
 बाहर निकल कर ,टहलने लगता है 
औरपत्नी अंदर ही रह जाती है
इससे पता लगता है मियां बीबी में ,
थोड़ी कम ही बनती है 
और अपनी अपनी पसंद को लेकर ,
दोनों में  में काफी ठनती है 
और कुछ पति पत्नी जब  बाहर आते है और 
पति का हाथ, शॉपिंग बैग्स से होता है लदा 
इससे पता लग जाता है ,
कि उनका वैवाहिक जीवन  
खुशियों से भरा रहेगा सदा 
बस यही हमारा शगल है 
मस्ती से वक़्त जाता गुजर है 
इन सब चीजों पर चर्चाएं ,
हमारे मन को बहलाती है 
और बुढ़ापे की एक और शाम ,
मस्ती से  कट जाती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

बुधवार, 28 जून 2017

एक दिन तुम ना रहोगे 


कब तलक यूं ही घुटोगे और आंसूं बन बहोगे 
एक दिन मै ना रहूँगा ,एक दिन तुम ना रहोगे 

हर इमारत की बुलंदी ,चार दिन की चांदनी है 
जहाँ पर रौनक कभी थी ,आज स्मारक बनी है 
पुराने महलों ,किलों से ,खंडहर बन कर ढ़होगे 
एक दिन मै ना रहूँगा,एक दिन तुम ना रहोगे 

तुमने तिनका तिनका चुन कर ,घोंसला था जो बनाया 
तिनका तिनका हो गया वो ,चार दिन बस  काम आया 
जाएंगे उड़ सब परिंदे ,  तुम बिलखते ही रहोगे 
एक दिन मै ना रहूंगा ,एक दिन तुम ना रहोगे 

वक़्त किसके पास है,कर कोई रहता व्यस्त हरदम 
सभी पीड़ित,व्यथित ,चिंतित,कोई ज्यादा तो कोई कम 
नहीं कोई भी सुनेगा ,वेदना किससे  कहोगे 
एक दिन मै ना रहूँगा,एक दिन तुम ना रहोगे 

बहुत गर्वित हो रहे हो,कर कमाई ढेर सारी 
लाख तुम करलो जतन पर जाओगे बस हाथ खाली 
बन के एक तस्वीर,कुछ दिन,दीवारों पर ,टंग रहोगे 
एक दिन मै ना रहूँगा,एक दिन तुम ना रहोगे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

खोट 

खोट थोड़ी हवाओं में है ,खोट कुछ मौसम में है 
खोट थोड़ी तुम में भी है, खोट थोड़ी हम में है 

दूसरों की कमियां ही हम सदा रहते  आंकते 
फटे अपने  गरेबाँ में ,कभी भी ना झांकते 
नाच ना आता ,बताते ,खोट कुछ आंगन में है 
खोट थोड़ी तुम में हैं और खोट थोड़ी हम में है 

खोट आयी दूध में तो ,फट गया ,छेना बना 
विचारों में खोट आयी ,हो गया मन अनमना 
घटा घिर यदि ना बरसती ,खोट क्या सावन में है 
खोट थोड़ी तुम में है और खोट थोड़ी हम में है 

जिंदगी में कुछ गलत हो और बुरे हो हाल गर 
दोष मढ़ते कुंडली पर ,और ग्रहों की चाल पर 
जो दहेज़ लाइ नहीं तो ,खोट क्या दुल्हन में है 
खोट थोड़ी तुम में है और खोट थोड़ी हम में है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
पियक्कड़ 


नहीं अप्सरा   बूढ़ी  होती ,   हूरें  रहे  जवान 
वृद्ध देवता कभी न होते ,करे सोमरस पान 
दवा और दारू से होते ,सारे मर्ज  सही है 
कभी कभी दो घूँट चढालो,इसमें हर्ज नहीं है 
भूलो दुनिया भर के सब गम और चिंताएं सारी 
डूब जाओ मस्ती में शामे हो गुलजार तुम्हारी 
कोई इसको मदिरा कहता ,कोई कहता हाला 
कोई घर के अंदर पीता  ,कोई जा मधुशाला 
चाहे देशी हो कि विदेशी ,मज़ा सभी में आता 
हम अपने पैसे की पीते ,कोई का क्या जाता  
हम दारू के सच्चे प्रेमी ,कोई से न डरे है 
फिर क्यों हमें पियक्कड़ कह कर सब बदनाम करे है 

घोटू 

शुक्रवार, 23 जून 2017

मीरा और  गोविन्द 
ए  मीरा अब छोड़  दे,जपना गोविंद नाम 
गोविंद तो कोविंद हुए ,कृष्ण हो गये राम 
कृष्ण हो गए राम ,देख कलयुग की माया 
राष्ट्रपति बनने का  उनने  दांव   लगाया 
कोविंद ,गोविंद भेद न जाने हृदय अधीरा 
कह 'घोटू' कवि ,पीछे पीछे  दौड़ी  मीरा 
२ 
आठ रानियों के पति ,फिर भी ना संतोष 
बनने को पति राष्ट्र का ,दिखा रहे है जोश
दिखा रहे है जोश ,प्रेम में  जिनके पागल 
बनी दीवानी ,मीरा ,भटकी ,जंगल जंगल 
प्रेम दिवानी मीरा ने पर आस न छोड़ी 
भाग रही है उनके पीछे  ,दौड़ी  दौड़ी 

घोटू  
 

सोमवार, 19 जून 2017

फादर डे 

हमारा बेटा ,अपनी व्यस्तता के कारण ,
फादर डे पर मिलने तो नहीं आया 
पर याद रख के एक पुष्पगुच्छ भिजवाया 
हमने फोन किया बरखुरदार 
धन्यवाद,भेजने को ये उपहार 
और दिखाने को अपना प्यार 
साल में एक बार जो इस तरह ,
फादर डे  मना लोगे
एक पुष्पगुच्छ भेज कर ,
अपना कर्तव्य निभा लोगे 
क्या इससे ही अपना पितृऋण चूका लोगे 
तुम्हारी माँ ,तुम्हारे इस व्यवहार से ,
कितना दुखी होती है 
छुप छुप कर रोती  है 
तुम्हे क्या बतलायें ,बुढ़ापे में ,माँ बाप को,
संतान के प्यार और सहारे की 
कितनी जरूरत होती है 
बेटे का जबाब आया 
पापा,हमने एक दिन ही सही ,
फादर डे तो मनाया 
पर क्या कभी आपने 'सन डे 'मनाया 
हमने  कहा बेटा ,हम सप्ताह में एक बार ,
और साल में बावन बार ,'सन डे 'मनाते है 
तुम्हे मिस करते है ,मन को बहलाते है 
और रिटायरमेंट के बाद तो,
हमारा हर दिन ही 'सन डे 'जैसा है 
हर माँ बाप के दिल में ,
बचपन से लेकर अंत तक ,
अपनी संतान के प्रति प्यार ,
भरा रहता  हमेशा है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
यादें पुरानी

यादें पुरानी कितनी ,जब साथ दौड़ती है 
तुम लाख  करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 
रातों को जब अचानक ,जाती है आँख खुल तो,
फिर सोने नहीं देती,इतना  झंझोड़ती  है 

कुछ घड़ियाँ वो ख़ुशी की ,कुछ पल पुराने गम के,
जो दबे ,छुप के  रहते , कोने में किसी  मन के 
कुछ घाव  पुराने से ,हो जाते फिर हरे  है 
जिनकी कसक से आंसू ,आखों में फिर भरें है 
रह रह के वो हमारे ,मन को मरोड़ती है 
तुम लाख करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 

 वो प्यार पहला पहला ,जब नज़र लड़ गयी थी 
रातों को जागने की , आदत सी   पड़  गयी थी 
 वो उनका रूठ जाना ,वो दिल का टूट जाना 
वो चुपके अकेले में ,आंसू का   फिर  बहाना 
कोई की बेवफाई ,जब दिल को  तोड़ती है 
तुम लाख करो कोशिश ,पीछा न छोड़ती है 

वो भूल जवानी की ,रो रो के फिर संभलना 
बंधन में बंध किसी संग ,फिर साथ साथ चलना 
बच्चों की करना शादी,और उनके घर बसाना 
फिर सारे परिंदों का ,पिंजरे को छोड़  जाना 
  तनहाई बुढ़ापे में , मन को कचोटती है 
तुम लाख करो कोशिश,पीछा न छोड़ती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
लिमिट में प्यार करो बीबी से 

अपनी बीबी से करो प्यार मगर बस इतना 
कि जो आसानी से पच जाये केवल बस उतना 
मिठाई ही मिठाई जो ,मिले  रोज खाने को 
विरक्ति मीठे से होती ,मिठाई के दीवाने को 
इस तरह प्यार का जो 'ओवर डोज' मिलता हो 
बिना मांगे ही अगर  रोज रोज  मिलता  हो 
सोच कर ये कि इससे बीबी रीझ जाती है 
हक़ीक़त ये है इससे बीबी खीझ  जाती  है 
इसलिए ढेर सारा प्यार नहीं बरसाओ 
थोड़ा सा प्यार करो,थोड़ा थोड़ा तरसाओ 
हमेशा पत्नी का पल्लू पकड़ के मत बैठो 
लिमिट में प्यार करो,थोड़ा झगड़ो और ऐंठो 
मिठाई साथ में ,नमकीन भी ,जरूरी है 
बढाती प्यार की है प्यास ,कभी दूरी है 
सताओ ऐसे ,उसके मन में आग लग जाए 
प्यार पाने उसके मन में तलब  जग जाए 
आग हो दोनों तरफ ,मज़ा जलने में  आता 
चाह हो दोनों तरफ,मज़ा मिलने में  आता 

मदन मोहन बाहत'घोटू' 
पिताजी आप अच्छे थे 

संवारा आपने हमको ,सिखाया ठोकरे सहना 
सामना करने मुश्किल का,सदा तत्पर बने रहना 
अनुभव से हमें सींचा ,तभी तो हम पनप पाये 
जरासे जो अगर भटके ,सही तुम राह पर लाये 
मिलेगी एक दिन मंजिल ,बंधाया हौंसला हरदम 
बढे जाना,बढे जाना ,कभी थक के न जाना थम 
जहाँ सख्ती दिखानी हो,वहां सख्ती दिखाते थे 
कभी तुम प्यार से थपका ,सबक अच्छा सिखाते थे 
तुम्हारे रौब डर  से ही,सीख पाए हम अनुशासन 
हमें मालुम कितना तुम,प्यार करते थे मन ही मन 
सरल थे,सादगी थी ,विचारों के आप सच्चे थे 
तभी हम अच्छे बन पाए ,पिताजी आप अच्छे थे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
तीन चौके 
१ 
अभी तो झेलना हमको, कई  तूफ़ान  बाकी  है 
चुकाने लोगों के अब तक,किये अहसान बाकी है 
जिन्होंने पीठ के पीछे,किया है  वार चुपके से ,
बहुत से ऐसे मित्रों की ,अभी पहचान  बाकी  है 
२ 
बड़े स्वादिष्ट होते ,दिल ,सभी का लूटते लड्डू 
अगर पुरसे हो थाली में,नहीं फिर  छूटते  लड्डू 
ख़ुशी,शादी के मौके पर ,सभी में बांटे जाते है,
हसीना कोई मुस्काती  ,तो मन में फूटते लड्डू 
३ 
अभी तक ये मेरी समझ में ये न आया 
 मेरी पोस्ट पर तुमने ,'थम्प्सअप 'लगाया     
ये मेरे विचारों की  तारीफ़ की  है ,
या फिर तुमने मुझको ,अंगूठा दिखाया 

घोटू 

गुरुवार, 15 जून 2017

रंग भेद की दरार

एक गेंहूं है ,एक चावल है ,
दोनों ही सबका पेट भर रहे है
दोनों ही अन्न है ,
पर लोग उनमे अंतर कर रहे है
गेंहूं का रंग भूरा है और चावल सफ़ेद है
इसलिए गेंहूं के साथ ,हमेशा होता रंगभेद है
वह बेचारा गौरवर्णी नहीं,
इसलिए हमेशा उसका दलन किया जाता है
उसे पीसा जाता है ,
उसका उत्पीड़न किया जाता है
और जब वो पिस कर आटे या मैदा जैसा ,
सफ़ेद नहीं हो जाता है
तब ही वो खाने के काम में आता है
हिन्दुस्थान में उससे रोटी,पूरी,परांठा ,
और हलवा बनाते है
विदेशी उसकी ब्रेड ,नूडल ,पिज़ा और पास्ता ,
बना कर खाते है
गेंहू ,अपना आकार खोकर  ,
हमेशा देते है अपना बलिदान
और सबका पेट भरते है ,
सेवा भावी है महान
पर फिर भी पूजा में उसे कलश के नीचे बिछाते है
और गौरवर्णी चावल को ,प्रभु पर चढ़ाते है
गेहूं पिस कर होता है क्षत विक्षत
और चावल रहता है अक्षत
गोरा,सफ़ेद ,सुन्दर,
पूरा का पूरा ही  पकाया जाता है
कभी पुलाव,कभी बिरयानी ,और अक्सर,
सादा  ही खाया जाता है
खिली खिली सी उसकी रंगत ,
और उसकी मुलायम सी सूरत
अनोखा स्वाद देती है ,जो मन को भाता है
और जब उसे दूध में पकाते है ,
तो खीर बन कर चौगुना स्वाद आता है
कभी मीठे केसरी भात ,
या कभी खिचड़ी बना कर उसे जाता है परोसा
तो कभी उससे इडली बनती है
और कभी बनता है डोसा
मस्तक पर तिलक लगा कर अक्षत से सजाते है
चावल के खाने को राजसी बतलाते है
देख कर के इस तरह का रंग भेद
और पक्षपाती व्यवहार
गेंहूं के मन में पद गयी है दरार
जिसका असर बाहर से भी
,उसके हर दाने पर है दिखता
जाने कब जायेगी ,हमारे दिलों से,
रंगभेद की ये मानसिकता

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

     बच्चों को बचपन जीने दो

आज बच्चों की ये हालत हो गयी है
बचपने की मौज मस्ती खो गयी है
कॉम्पिटिशन से डरे,सकुचाये मन में
आज बच्चे ,जी रहे है ,टेंशन में
माँ पिता भी जाने क्या क्या सोचते है
अपने सपने,बच्चो पर वो थोपते है
कार्बाइड से पके ज्यों आम कच्चा
ले रहा इस तरह कोचिंग हरेक बच्चा
कभी हमने भी तो था बचपना जिया
माँ की छाती  से लगे थे ,दूध पिया
बोतलों का उन दिनों  फैशन नहीं था
मातृत्व से बड़ा तब  यौवन  नहीं था
लोरियां सुनते थे आती नींद तब थी
पालने में झूलने की उमर  जब थी
उन दिनों ना क्रेच थे ना नर्सरी थी
घर की रौनक ,भाई बहनो से भरी थी
 जिद पे आते ,रखते थे सबको नचा के
खेलते थे ,झुनझुना ,खुश हो बजा के
 सीधासादा  ,प्यारा सा ,बचपन वही था
हाथ में बच्चों के  मोबाईल नहीं था
बड़े हो स्कूल जब जाने लगे हम
गिल्ली डंडा और कबड्डी ,खेले हरदम
स्कूलों में ही सिर्फ करते थे पढाई
नहीं कोचिंग या कोई ट्यूशन लगाईं
फर्क इतना आगया हालात में अब
एक मोबाईल सभी के हाथ में अब
उसी पर ऊँगली घुमाकर व्यस्त रहता
पढाई के बोझ से वो त्रस्त रहता
कॉम्पिटिशन भूत सर पर चढ़ रहा है
खेलता ना,सिर्फ बच्चा पढ़ रहा है
डॉक्टर ,इंजीनियर सब चाहे बनना
इसलिए दिनरात पड़ता उन्हें खटना
और फिर भी कितने है जो चूक जाते
उनके देखे ,सभी सपने ,टूट जाते
और 'डिप्रेशन' उन्हें फील सालता है
मगर इसमें उनकी होती क्या खता है
सब के सब उत्तीर्ण तो हो नहीं सकते
बोझ क्षमता से अधिक ढो नहीं सकते
अतः बेहतर,नहीं थोंपे खुद को उन पर
मन मुताबिक़ ,बनाने दे ,अपना फ्यूचर
बोझ ज्यादा ,पढाई का ,नहीं लादें
जीने उनको ,प्रेम से निज बचपना दे
क्योंकि बचपन ,नहीं आता लौट कर है
जिंदगी की,सबसे प्यारी ,ये उमर  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


सभी को अपनी पड़ी है
सभी को अपनी पड़ी है ,
कौन किसको पूछता है
पालने को पेट अपना,
हर एक बंदा जूझता है
कोई जुट कर जिंदगी भर ,
है सभी साधन जुटाता
कोई पाता विरासत में ,
मौज जीवन भर मनाता
कोई जीवन काटता है,
कोई जीवन जी रहा है
कोई रहता है चहकता ,
कोई आंसू पी रहा है
अपनी अपनी जिंदगी का,
नज़रिया सबका अलग है
कोई तो है मस्त मौला ,
कोई चौकन्ना,सजग है
कोई जाता मंदिरों में ,
लूटने दौलत धरम की
ये जनम तो जी न पाता ,
सोचता अगले जनम की
गंगाजी में लगा डुबकी,
पाप कोई धो रहा है
और वो इस हड़बड़ी में,
आज अपना खो रहा है
कोई औरों के फटे में ,
मज़ा लेकर झांकता है
अपनी कमियों को भुलाकर ,
दूसरों की ,आंकता है
नहीं नियति बदल सकती ,
भाग्य के आधीन सब है
उस तरह से नाचते है ,
नचाता जिस तरह रब है
बहा कर अपना पसीना ,
तुमने जो दौलत कमाई
वो भला किस कामकी जो ,
काम तुम्हारे न आयी
इसलिए अपनी कमाई,
का स्वयं उपभोग कर लो
जिंदगी जितनी बची है,
उतने दिन तक मौज कर लो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
नयन

नयन जिनमे बसते है सपने सुनहरे ,
नयन मिलते ,परिणिती होती मिलन में
नयन जो कि चमकते है ,हर ख़ुशी में,
नयन जो कि छलकते है हरएक गम में
नयन जिनमे भरे है  आंसूं  हजारों
नयन जो कि नींद के काफी सगे  है
नयन कजरारे सदा मन मोहते है ,
नयन जिससे दुनिया ये सुन्दर लगे है
नयन जिनमे छवि जब बसती किसी की ,
प्रेम की अनुभूति का आनंद होता
नयन खुलते ,जागृत होता है जीवन ,
नयन होते बंद,जीवन  अंत होता
नयन जो की आइना है भावना का,
नयन का रंग क्रोध में है लाल होता
नयनो  में छाती गुलाबी डोरियाँ जब ,
प्रेमियों का मिलन और अभिसार होता
नयन जब निहारते है ,अपलक तो,
बने भँवरे,रूप का रसपान करते
नयन आधे बंद ,करते सोच चिंतन,
बंद होकर ,योग करते,ध्यान धरते
नयन से ही किसी की पहचान होती ,
नयन से ही हम किसी को आंकते है
नयन नटखट ,बावरे शैतान भी है,
चुप न रहते ,सदा इत उत झांकते है
नयन खोये खोये रहते प्यार में है,
नयन रोये रोये रहते , रार में है
नयन से ही हमें गोचर है सभी कुछ,
प्रभु का वरदान ये संसार  में है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मंगलवार, 13 जून 2017

टमाटर

टमाटर महान होता है
सब्जियों की शान होता है
यह एक बहु उपयोगी चीज है
जो भोजन को बनाती लजीज है
'सेंडविच' में दबाकर खाया जाता है
पीज़ा पर भी बिछाया जाता है
सभी प्रेम से पीते टमाटर का सूप है
सेहत के लिए अच्छा और स्वाद अनूप है
टमाटर की ग्रेवी के बिना ,
सब्जियों में स्वाद नहीं आता है
और टमाटर का ज्यूस भी,
काफी पसंद किया जाता है
इसके रस में ,'वोदका 'नामक मदिरा मिला ,
'ब्लडी मेरी' नामक कॉकटेल प्रेम से पी जाती है
और सुन्दर सुन्दर रक्तिम कपोलों को ,
लाल टमाटर जैसे गालों की तुलना दी जाती है
पर ऐसे गाल ,अक्सर ठन्डे मुल्कों के ,
गोर लोगों के ही पाए जाते है
पर हम बचपन का अपना अनुभव सुनाते है
जब हमारी गलती पर ,मास्टरजी या पिताजी,
जब गालों पर जोरदार चपत लगाते थे
हमारे गाल भी टमाटर जैसे लाल हो जाते थे
हनुमान जी भी,बचपन में ,उगते सूरज को ,
टमाटर समझ कर,खाने को दौड़े थे
दुनिया में त्राहि त्राहि मच गयी थी,और
देवताओं की विनती पर बड़ी मुश्किल से छोड़े थे
टमाटर ,कराता है शादी का अहसास
क्योंकि शादी के बाद ही मिलती है सास
और टमाटर होता है ,तभी सॉस बन पाती है
बड़ी चटपटी और मजेदार होती है और ,
समोसे और पकोड़ों का स्वाद बढाती है
जैसे हम ,एक दूसरे पर रंग फेंक कर ,
होली का त्योंहार मनाते है
स्पेन देश में ,'टोमेटिनो' उत्सव में ,
एक दूसरे पर पके टमाटर फेंके जाते है
टमाटर की उपयोगिता ,तब भी नहीं घटती ,
जब कि यह सड़ जाता है
विपक्षी नेताओं के भाषण के समय ,
विरोध प्रदर्शन के लिए ,इसे फेंका जाता है
टमाटर होते बड़े मिलनसार है
लगभग सभी सब्जियों से इनका दोस्ताना व्यवहार है
सच तो ये है कि टमाटर के बिना ,
सब्जियों में स्वाद नहीं आता है
इसीलिए टमाटर ,सब्जियों का राजा कहलाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

गुरुवार, 8 जून 2017

तुलसीदल 

कल मैं कुछ लाचार और बदहाल लोगों से मिला ,
दोस्त मेरे सब के सब ,पागल मुझे  कहने लगे 
माटी,माटी ठीक थी और पानी,पानी ठीक था ,
मिले दोनों जब तो सब ,दलदल उसे कहने लगे 
गंदा नाला  बहते बहते  ,जा के गंगा से मिला,
बदली किस्मत ,लोग गंगाजल  उसे कहने लगे 
काट कर जंगल उगाली ,ऊंची अट्टालिकाएं,
और फिर कांक्रीट का ,जंगल  उसे कहने लगे 
मीठा जल नदियों का खारे समन्दर से मिला पर,
धूप में तप जब उड़ा ,बादल  उसे कहने  लगे 
लड्डू का परशाद सारा ,पुजारी  चट कर गए,
प्रभु के हित जो बचा ,तुलसीदल उसे कहने लगे 

मदनमोहन बाहेती'घोटू' 

बुधवार, 7 जून 2017

नयन की डोर 

नयन जिनमे बसते है सपने सुनहरे ,
नयन जो की डोर बांधे है मिलन में
नयन जो कि  चमकते है हर ख़ुशी में ,
नयन जो कि  छलकते है हरेक गम में 
नयन जिनमे कि भरा है अश्रु का जल ,
नयन जो कि नींद के  लगते  सगे  है 
नयन जो सज ,रूप करते चौगुना है,
नयन जिनसे दुनिया ये सुन्दर लगे है 
नयन जिनमे छवि जब बसती किसीकी ,
प्रेम की अनुभूति का आनंद  होता 
नयन खुलते ,जागृत होता है जीवन,
नयन होते बंद ,जीवन अंत  होता 
नयन जो कि भावना का आइना है,
नयन का रंग क्रोध में है लाल होता 
नयन में छाती गुलाबी डोरियां जब,
प्रेमियों का मिलन औरअभिसार होता 
नयन जब निहारते है अपलक तो,
बने भँवरे ,रूप का रसपान  करते 
नयन आधे बंद ,करते सोच ,चिन्तन ,
बंद होकर ,योग करते,ध्यान धरते 
नयन जब झुकते ,समझलो भरी हामी,
अधमुंधे से नयन ,समझो छायी मस्ती 
छवि जिसकी बसा करती है नयन में ,
चुरा लेती हृदय ,ऐसी दिल में बसती 
चुराते है हम कभी नयना  किसी से,
दिखाते है हम कभी नयना किसी को 
मिलाते है जब नयन हम जो किसी से 
कोई अच्छा बहुत लगने लगता जी को 
नयन से ही किसी की पहचान होती ,
नयन से ही हम किसी को आंकते है 
नयन नटखट ,बावरे  शैतान भी है,
चुप न रहते ,सदा  इत उत झांकते है  
नयन खोये खोये रहते प्यार में है ,
नयन रोये रोये रहते   रार में है 
नयन से ही हमे  गोचर है सभी सुख ,
प्रभु का वरदान ये संसार में  है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
जी का कमाल 

हमने उनसे पूछा कुछ तो उनने हमसे ' जी' कहा 
हमने कुछ माँगा तो जैसी आपकी मरजी   कहा 
उनकी इस छोटीसी 'जी' ने ,ऐसा जी में घर किया 
हमको एक उत्साह से और एनर्जी से  भर दिया 
झट से राजी हो गए हम ,भुगतते है  उसका फल 
उनकी 'हाँ जी ,हाँ जी'करते कटते है दिन आजकल

घोटू  
बीबी लगती है परी 

उमर ने ढाया कहर ,ना  रही  काया  छरहरी 
मगर बीबी सबको अपनी ,हमेशा लगती परी 
क्योंकि वो ही इस उमर में,घास तुमको डालती 
बिमारी में और मुश्किल में तुम्हे  संभालती 
सर जो दुखता ,तो दबाती,बाम सर पर मल तुम्हे 
चाहते जब ,चाय संग ,देती पकोड़े  तल  तुम्हे 
पीठ खुजलाती तुम्हारी और दबाती पैर  है 
मंदिरों में पाठ  पूजा ,कर मनाती खैर है  
तुम्हारे खर्राटों में भी ,ठीक से सो पाए जो 
तुम्हारी तकलीफ ,पीड़ा में बहुत घबराये जो 
हमेशा जो चाहती है ,तुम्हारी लम्बी उमर 
रहती पूरे दिवस भूखी,बरत करवा चौथ कर 
टाइम टाइम पर दवाई की ,वो दिलाती याद है 
जिसके कारण छाई खुशियां सारा घर आबाद है  
काम घर के करे सारे ,चाहे कितना भी थके 
सारे रीति रिवाजों का ,ध्यान जो पूरा रखे 
जवानी में काम में हम सदा रहते व्यस्त थे 
याद करिये ,बीबी को हम ,देते कितना वक़्त थे 
सिर्फ आकर बुढ़ापे में ,होती ऐसी बात है 
मियां बीबी साथ में रहते सदा ,दिन रात है 
उसकी सब अच्छाइयों का ,हमें होता भान है 
पूर्ण जो तुम पर समर्पित बीबी गुण की खान है 
पसंदीदा खाना मिलता ,समय पर,उसकी वजह 
इस उमर मे हम हैं  उस पर आश्रित ,पूरी तरह 
भले उसको अब न भाते ,जवानी के चोंचले 
मगर फिर भी बुलंदी पर रहते उसके हौंसले 
होश अब भी ,उड़ा देती, उसकी नज़रें मदभरी 
इसलिए ही बीबी अपनी ,सबको लगती है परी 

मदन मोहन बाहेती' 'घोटू'
छेड़छाड़  

आज सवेरे छेड़छाड़ का ,
एक नया मामला नज़र आया 
लड़कियों के कॉलेज आगे ,
एक काला सा रोमियो ,बादल था मंडराया 
आतीजाती लड़कियों पर ,
छींटाकशी  रहा था कर  
लड़कियां भाग रही थी ,
दुपट्टे से छुपा कर ,अपना सर 
पर वो अपनी हरकत से ,
बाज नहीं आ रहा था 
कभी आवाजे निकालता था ,
कभी खीसें निपोर ,दांत चमका रहा था 
तभी 'रोमियो स्कवाड 'की इंस्पेक्टर 
हवा आयी और ले गयी ,
बादल को अपने साथ पकड़ कर 
समझ में आया आज है 
कैसा  रोमियो मुक्त ,योगी का राज है 

घोटू 

मंगलवार, 6 जून 2017

यूं ही उहापोह में 

उलझते ही रहे हम आरोह और अवरोह में 
जिंदगी हमने बिता दी,यूं ही उहा पोह में 

दरअसल क्या चाहिये थी नहीं खुद को भी खबर 
कहाँ जाना है हमें और कहाँ तक का है सफर 
डगर भी अनजान थी और हम भटकते ही रहे ,
कभी इसकी टोह में और कभी उसकी टोह में 
जिंदगी हमने बिता दी ,यूं ही उहापोह  में 

दोस्त कोई ,कोई दुश्मन ,लोग कितने ही मिले 
दिया कोई ने सहारा ,किसी ने दी मुश्किलें 
हाल कोई ने न पूछा ,नहीं जानी खैरियत,
उमर सारी ,हम तड़फते रहे जिनके मोह में 
जिंदगी हमने बिता दी ,यूं ही उहापोह में 

बेकरारी में दुखी हो, दिन गुजरते ही रहे 
रोज हम जीते रहे और रोज ही मरते रहे 
ऐसी स्थिरप्रज्ञ अब हालत हमारी होगयी ,
अब मिलन में सुख न मिलता,और गम न विछोह में 
जिंदगी हमने बिता दे ,यूं ही उहापोह में 

घोटू 
आशिक़ी का मजा 


ठीक से ना देख पाते  ,नज़र भी कमजोर  है 
अस्थि पंजर हुए ढीले ,नहीं तन में जोर है 
खाली बरतन  की तरह हम खूब करते शोर है
दिल की इस दीवानगी का मगर आलम और है 
देख कर के हुस्न को बन जाता आदमखोर है 
हमेशा ये दिल कमीना ,मांगता कुछ 'मोर ' है 
शाम ढलती है ,उमर का ,आखिरी ये छोर है 
बुढ़ापे की आशिकी का ,मज़ा ही कुछ और है 

घोटू 
पक्षपात 

'फेवरेटिस्म ' याने की पक्षपात 
युगों युगों से चाय आ रही है ये बात 
किसी अपने चहेते का ,करने को उत्थान 
किसी अन्य काबिल व्यक्ति का बलिदान 
ये सिलसिला महाभारत काल से चला आ रहा है 
अपने पट शिष्य अर्जुन को शीर्ष पर रखने के लिए ,
द्रोणाचार्यों द्वारा
 एकलव्य का अंगूठा काटा जा रहा है 
सूतपुत्र कह कर कर्ण को ,
उसके अधिकारों से वंचित  करवाना 
ये 'पॉलिटिक्स' तो है काफी पुराना 
एकलव्य 'शिड्यूल ट्राइब 'और
कर्ण 'शेड्यूल कास्ट' था 
और उन दिनों 'रेज़र्वेशन'का ' बेनिफिट 'भी,
नहीं उनके पास था 
इसलिए अच्छे खासे काबिल होने पर भी ,
ये दोनों पनप  नहीं पाए 
गुरुदक्षिणा के नाम पर ,
एकलव्य का अंगूठा कटवा दिया गया ,
और कुंती पुत्र होने पर भी 
कर्ण ,सूतपुत्र ही कहलाये 
श्री कृष्ण ने भी ,जब था महाभारत का संग्राम 
अपने फेवरिट अर्जुन की ऊँगली रखी थी थाम 
उसके रथ का सारथी  बन ,
कृष्ण अर्जुन को अपनी मन मर्जी के माफिक घुमाते थे 
और वो जब अपने भाई बंधुओं से लड़ने से हिचकता था,
उसे गीता का ज्ञान  सुनाते थे 
और फिर उसके पक्ष  को जिताने के लिए,
कृष्णजी ने क्या क्या खेल नहीं खेले 
बर्बरीक का सर कटवाया ,कितने पापड़  बेले 
अपनी सोलह कलाएं ,
अपने फेवरिट को जिताने के लिए लगा दी 
इतने लोगों का सपोर्ट होते हुए भी ,
कौरवों की पराजय करवा दी 
कभी कभी अपने एक को फेवर देने के चक्कर में ,
दूसरों का भी फायदा है हो जाता 
अगर ये पक्षपात न होता ,
तो क्या हमें गीता का ज्ञान मिल पाता 
'फेवरिटिस्म 'से तो बच नहीं पाए है भगवान्
जो श्रद्धा से उनकी भक्ति करे ,
उसे वरदान देकर होते है मेहरबान 
भले ही वरदान पाकर ,
वो उन्ही के अस्तित्व को खतरा बन जाए 
और भस्मासुर की तरह 
उन्ही के पीछे पड़  जाए 
पर जब किसी की सेवा और भक्ति ,
आपको इतना अभिभूत कर दे ,
कि आपका अहम् ,
उसे उपकृत करने को आमादा हो जाए 
तो फिर कौन किसको समझाये 
ऐसे हालत में आप अपना ही नुक्सान करते है 
अपने ही हाथ 
ऐसे में कभी कभी ,पक्षपात,
बन जाता है आत्मघात 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
             देश-परदेश 

वहां ये है,वहां वो है ,बहुत सुनते शोर थे ,
मन में उत्सुकता जगी तो हमने भी सोचा चलें 
हक़ीक़त में वो जगह कैसी है,कैसे लोग है,
चलो हम भी देख लें,दुनिया की सारी हलचलें 
गुजारे दो चार दिन तो शुरू में अच्छा लगा ,
मगर थोड़े दिनों में ही लगा कितना फर्क है 
देख कर भौतिक सुखों को, ऐसा लगता स्वर्ग है,
मगर जब रहने लगो तो होता बड़ा गर्क  है 
भावना से शून्य सब  और है मशीनी जिंदगी,
मुल्क ठंडा ,लोगों के दिल की भी ठंडक देख ली 
सर्दियों में बर्फ के तूफ़ान से घिरते रहे ,
जगमगाती हुई रातों की भी रौनक देख ली 
भाईचारा कम मिला और लोग प्रेक्टिकल लगे,
आत्मीयता ,अपनापन ज्यादा नज़र आया नहीं 
चार दिन में यहाँ बनती,टूटती है जोड़ियां,
सात जन्मों का यहाँ पर संग दिखलाया नहीं 
जी रहे है लोग सारे ,अपनी अपनी जिंदगी ,
ले कभी सुध दूसरों की,किसी को फुर्सत नहीं 
रोज मिल जुल  बैठना ,वो यारी और वो दोस्ती 
गुमशुदा थे ये सभी,जज्बात की कीमत नहीं 
'डीप फ्रिज'में रखा खाना ,गर्म करिये,खाइये,
सौंधी सौंधी रोटियों की ,वहाँ खुशबू ना मिली 
बहुत खुल्लापन नज़र आया वहां संबंध में ,
मिला मुश्किल से किसी में ,वहां पर रिश्ता दिली 
अगर बेशर्मी खुलापन ,प्रगति की पहचान है ,
तो यकीनन ही वहां के लोग प्रगतिशील है 
मगर मेरे देश में है लाज,पर्दा आज भी ,
होता सन्मानित यहाँ पर नारियों का शील है 
वहां पर चौड़ी है सड़कें ,पर हृदय संकीर्ण है ,
यहाँ पर पगडंडियों में भी बरसता प्यार है 
वहां पर तो अकेलापन ,आदमी को काटता ,
और यहाँ पर भाईचारा,दोस्ती,,परिवार है 
वहां भी है पेड़ पौधे ,यहाँ पर भी वे सभी,
मगर पीपल,आंवला वट वृक्ष ,पूजित है यहाँ 
वहां नदियाँ,यहाँ नदियां ,बहती है हरदम सभी,
मगर माता मान कर ,नदियाँ सभी वन्दित यहाँ 
यहाँ सब रहते है मिल कर ,प्यार है,परिवार है 
तीसरे चौथे दिवस मनता कोई त्योंहार है 
यहाँ माता पिता बोझा नहीं आशीर्वाद है ,
ये यहाँ की संस्कृति के दिए सद संस्कार है
घूम फिर कर मैंने पाया ,देश मेरा धन्य है,
यहाँ जैसा सुखी जीवन ,कहीं पर भी है नहीं 
यहाँ का ऋतुचक्र ,सर्दी गर्मी,बारिश औ बसंत,
प्रकृति की ऐसी नियामत ,नज़र ना आयी कहीं 
पूजते माँ बाप को सब,संग सब परिवार है ,
सात फेरों में है बंधन ,सात जन्मों का यहाँ 
पति की लम्बी  उमर की कामना में भूखी रह ,
वरत करवाचौथ का ,करती कोई औरत कहाँ 
खाओ पीयो ,मौज करलो ,है वहां की संस्कृति ,
अहमियत ना नाते रिश्तों की ,न अपनापन वहां 
मेरी जननी,जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है ,
नतीजा मैंने निकाला ,घूम कर सारा जहाँ 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सोमवार, 29 मई 2017

पैसे वाले 

ऐसे वाले ,  वैसे  वाले 
खेल बहुतसे खेले खाले 
चाहे उजले ,चाहे काले 
लोग बन गए पैसे वाले 

थोड़े लोग 'रिजर्वेशन'के 
थोड़े चालू और तिकड़म के 
कुछ लक्ष्मीजी के वाहन, पर ,
घूम रहे ऐरावत  बन के 
मुश्किल से ही जाए संभाले 
लोग बन गए पैसे वाले 

होते कुछ नीयत के गंदे 
कुछ के उलटे गोरखधंधे 
कुछ है मेहनत वाले बंदे 
कुछ है एनआर आई परिंदे 
यूरो,डॉलर  जैसे वाले 
लोग बन गए पैसे वाले 

कोई रिश्वत खाये भारी 
कोई करे कालाबाज़ारी 
कुछ है ,उडा रहे जो मौजें ,
कर्जा लेकर,दबा उधारी 
लूटो जैसे तैसे वाले 
लोग बन गए पैसे वाले 

पास किसी के धन है काला 
भरा समंदर है पर खारा 
कोई पर पुश्तैनी दौलत ,
कोई 'पेंशन' से करे गुजारा 
जीते ,जैसे तैसे  वाले 
लोग बन गए पैसे वाले 

घोटू 
बढ़ती हुई उम्र 

बढ़ती हुई उमर  में अक्सर ,ऐसे हाल नज़र आते है 
मुंह पोपला सा लगता है, पिछले गाल नज़र आते है
 
कभी फूल सा महकाता मुख,लगता मुरझाया,मुरझाया 
छितरे श्वेत बाल गालों पर ,काँटों का हो जाल बिछाया 
या तो सर गंजा होता या   उड़ते बाल नज़र आते है 
बढ़ती हुई उमर  में अक्सर ,ऐसे हाल नज़र आते है 

कभी चमकती थी  जो आँखें,अब लगती धुंधलाई सी है 
बाहुपाश वाले हाथों पर ,आज झुर्रियां  छाई  सी है 
यौवन का धन जब लुट जाता ,सब कंगाल नज़र आते है 
बढ़ती हुई उमर  में अक्सर ,ऐसे हाल नज़र आते है 

तन कर चलने वाला ये तन,हो जाता अशक्त,ढीला है 
लाली लिए कपोलों का रंग ,अब पड़ने लगता पीला है 
थोड़े बेढब और बेसुरे ,हम बदहाल  नज़र आते है 
बढ़ती हुई उमर में अक्सर ,ऐसे हाल नज़र आते है 

फिर भी कोई सुंदरी दिखती,तो मन मचल मचल जाता है 
मुई आशिक़ी नहीं  छूटती ,तन कितना ही ढल जाता है 
याद जवानी के बीते दिन,,गुजरे साल नज़र आते है 
बढ़ती हुई उमर में अक्सर ,ऐसे हाल  नज़र आते है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
जीने में मुश्किल होती है 

इतनी सुविधा ग्रस्त हो गयी ,आज हमारी जीवनशैली ,
कि विपरीत परिस्तिथियों में ,जीने में मुश्किल होती है 
यूं तो कई सफलता मिलती ,पर आनंद तभी आता है ,
पग पग बाधाओं से लड़ कर ,जब मंजिल हासिल होती है 

गर्दन में रस्सी बंधवा कर ,गगरी कुवे में जाती है ,
पानी में डूबा करती है ,तब उसका रीतापन भरता 
कभी किसी पनिहारिन हाथों ,ओक लगा ,पीकर तो देखो,
तुम्हे लगेगा ऐसा जैसे ,कलशों से है  अमृत  झरता 
पर अब ये सुख ,मिल ना पाता ,क्योंकि नल जल के आदी हम,
प्यास हमारी तब बुझती है ,जब कि बोतल 'चिल ' होती है 
इतनी सुविधा ग्रस्त हो गयी,आज हमारी जीवन शैली,
कि विपरीत परिस्तिथियों में ,जीने में  मुश्किल होती है 

बाती  डूबी रहे तैल में और जलाती रहती खुद को ,
तब ही अंत तिमिर का होता ,और जगमग होता है जीवन 
दीवाली को दीपोत्सव में ,सजती है दीपों की माला,
रोज आरती और पूजा में ,दीप प्रज्जवलित करते है हम 
आत्मोत्सर्ग दीपक करते है ,हमको लगते टिमटिम करते  
बिजली की बिन ,हमे एक पल ,ख़ुशी नहीं हासिल होती है 
इतनी सुविधाग्रस्त हो गयी ,आज हमारी जीवन शैली ,
कि विपरीत परिस्तिथियों में,जीने में मुश्किल होती है 

शीतल हवा ,वृक्ष की छाया ,भुला दिया ऐ,सी,कूलर ने,
निर्मलता नदियों के जल की,हजम कर गया है 'पॉल्यूशन'
परिस्तिथियाँ कम बदली है,उससे ज्यादा बदल गए हम,
भौतिकता में ऐसे उलझे,भूल गए प्रकृति का पोषण  
भूल गए सब रिश्ते नाते, भूले हम अहसानफरोशी ,
क्या ऐसी जीवन पद्धिति भी,जीने के काबिल होती है 
इतनी सुविधाग्रस्त हो गयी ,आज हमारी जीवनशैली ,
कि विपरीत परिस्तिथियों में ,जीने में मुश्किल होती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
दास्ताने मजबूरी 

कभी हम में भी तपिश थी ,आग थी,उन्माद था ,
      गए अब वो दिन गुजर ,पर भूल हम पाते  नहीं 
तमन्नाओं ने बनाया इस कदर है बावला ,
      मचलता ही रहता है मन ,पर हम समझाते नहीं 
जब महकते फूल दिखते या चटकती सी कली,
      ये निगोड़े  नयन  खुद पे ,काबू  रख  पाते  नहीं 
हमारी मजबूरियों की इतनी सी है दास्तां ,
       चाहते है चाँद  ,जुगनू  तक पकड़  पाते  नहीं 

घोटू  
अप्सरा बीबी 

ज्यों  अपने घर का खाना ही ,सबको लगता स्वादिष्ट सदा 
अपने खटिया और  बिस्तर पर,आती है सुख की नींद सदा  
जैसे अपना हो  घर छोटा  ,पर हमें  महल सा लगता है 
अपना बच्चा कैसा भी हो ,पर  खिले कमल सा लगता है 
हर पति को बिस्तर पर बीबी ,सदा अप्सरा लगती  है 
अच्छी अच्छी हीरोइन से ,नहीं कम जरा  लगती है
मीठी मीठी बात बना कर ,पति पर जादू  चलवाती   
कुछ मुस्का कर,कुछ शरमा कर,बातें सारी मनवाती
महकाती उसकी रातों को ,महक मोगरा  लगती है 
हर पति को बिस्तर पर बीबी,सदा अप्सरा लगती है 
कभी मोम  की गुड़िया लगती,कभी भड़कता सा शोला 
कभी रिझाती अपने पति को,दिखला कर चेहरा भोला 
ना ना  कर पति को तड़फती,नाज और नखरा करती है 
हर पति  को बिस्तर पर बीबी ,सदा अप्सरा लगती है 
शेर भले कितना हो पति पर ,वो बीबी से डरता है 
उस आगे भीगी बिल्ली बन ,म्याऊं ,म्याऊं करता है 
अच्छे भले आदमी को वो  ,इतना पगला करती है 
हर पति को बिस्तर पर बीबी , सदा अप्सरा लगती है 
पूरी निष्ठा से फिर खुद को पूर्ण समर्पित  कर देती 
दिल से सच्चा प्यार लुटा ,जीवन में खुशियां भर देती 
लगती साकी और कभी खुद,जाम मदभरा  लगती है 
हर पति को बिस्तर पर बीबी,सदा अप्सरा  लगती है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'' 

भूटान में 

मैं तुम्हे क्या बताऊँ ,भूटान में क्या है 
उन हरी भरी  पहाड़ियों का ,अपना ही मज़ा है 
वो प्रकृति के उरस्थल पर ,उन्नत उन्नत शिखर 
जिनके सौंदर्य का रसपान ,मैंने किया है जी भर 
उन उन्नत शिलाखंडों में शिलाजीत तो नहीं मिल पायी 
पर उनके  सानिध्य  मात्र से, मिली एक ऊर्जा सुखदायी 
मैं आज भी उन पहाड़ों के स्पंदन को महसूस करता हूँ 
और प्रसन्नता से सरोबार होकर ,
फिर से उन घाटियों में विचरता हूँ
जी करता है कि मैं मधुमक्खी की तरह उड़ कर,
फिर से लौट जाऊं उन शिखरों पर 
और वहां खिले हुए फूलों का रसपान कर लू 
और मीठी यादों का ,ढेर सारा मधु ,
अपने दिल  में भर लू 
वहां की हवाओं की सौंधी सौंधी खुशबू,
आज भी मेरे नथुनों में बसी हुई है 
वो नीले नीले पुष्पों की सेज ,
आज भी मेरे सपनो में सजी हुई है 
जैसे गूंगे को ,गुड़ का स्वाद बताना मुश्किल है 
वैसे ही मुझे भी ,वहां की याद भुलाना मुश्किल है 

घोटू 
  
सभी को अपनी पड़ी है 

सभी को अपनी पड़ी है ,
कौन किसको पूछता है 
पालने को पेट अपना,
हर एक  बंदा जूझता है 
कोई जुट कर जिंदगी भर ,
है सभी साधन जुटाता 
कोई पाता विरासत में ,
मौज जीवन भर मनाता 
कोई जीवन काटता है,
कोई जीवन जी रहा है 
कोई रहता है चहकता ,
कोई आंसू पी रहा है 
अपनी अपनी जिंदगी का,
नज़रिया सबका अलग है 
कोई तो है मस्त मौला ,
कोई चौकन्ना,सजग है 
कोई जाता मंदिरों में ,
लूटने दौलत धरम की 
ये जनम तो जी न पाता ,
सोचता अगले जनम की 
गंगाजी में लगा डुबकी,
पाप कोई धो रहा है 
और वो इस हड़बड़ी में,
आज अपना खो रहा है 
कोई औरों के फटे में ,
मज़ा लेकर झांकता है 
अपनी कमियों को भुलाकर ,
दूसरों की ,आंकता है 
नहीं नियति बदल सकती ,
भाग्य के आधीन सब है 
उस तरह से नाचते है ,
नचाता जिस तरह रब है 
बहा कर अपना पसीना ,
तुमने जो दौलत कमाई 
वो भला किस कामकी जो ,
काम तुम्हारे न आयी 
इसलिए अपनी कमाई,
का स्वयं उपभोग कर लो 
जिंदगी जितनी बची है,
उतने दिन तक मौज है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 बेबसी 

कुछ के आगे बस चलता है. ,कुछ के आगे हम बेबस है ,
     कहने को मरजी  के मालिक,रहते किस्मत पर निर्भर है 
लेकिन हम अपनी मजबूरी ,दुनिया को बता नहीं पाते ,
       जिस को पाने को जी करता ,वो चीज पहुंच के बाहर है 
क्या खाना है ,क्या पीना है,इस पर बस चलता है अपना ,
       इस पर न जबरजस्ती कोई ,जो मन को भाया,वो खाया 
बालों पर चलता अपना बस ,क्योंकि ये घर की खेती है ,
       जब भी जी चाहा ,बढ़ा लिए ,जब जी में आया,मुंडवाया 
जब जी चाहा, जागे,,सोये, जब जी चाहा ,नहाये ,धोये,
       लेकिन जीवन के हर पथ पर ,अपनी मरजी कब चलती है 
कुछ समझौते करने पड़ते ,जो भले न दिल को भाते है 
           रस्ते में  यदि  हो बाधाएं ,तो  राह  बदलनी  पड़ती  है 
लेकिन ये होता कभी कभी,कि अहम बीच में आजाता ,
      तो फिर मन को समझाने को ,हमने कुछ ऐसा काम किया 
शादी के बाद पड़ी पल्ले ,बीबी तो बदल नहीं सकते ,
        तो फिर मन की सन्तुष्टि को,हमने बिस्तर ही बदल लिया 

घोटू 
इस ढलते तन को मत देखो 

कोई कहता ढलता सूरज,कोई कहता बुझता दिया,
          कोई कहता सूखी नदिया ,मुरझाया फूल कोई कहता 
मै कहता हूँ कि मत देखो ,तुम मेरे इस ढलते तन को..  ,
         इस अस्थि पंजर के अंदर ,मस्ती का झरना है  बहता 
है भले ढली तन की सुर्खी,है भरा भावनाओं से मन ,
               ढले सूरज में भी होती,उगते सूरज की लाली   है 
माना है जोश नहीं उतना ,पर जज्बा अब भी बाकी है,
            अब भी तो ये मन है रईस ,माना तन पर कंगाली है 
मत उजले केशों को देखो ,मत करो नज़रअंदाज हमें,
               अंदाज हमारे देखोगे ,तो घबरा गश खा जाओगे 
स्वादिष्ट बहुत ये पके आम,हैं खिले पुराने ये चांवल,
             इनकी अपनी ही लज्जत है ,खाओगे,भूल न पाओगे 

घोटू 

गुरुवार, 25 मई 2017

वाहन सुख 

कुछ लक्ष्मीजी के वाहन पर ,ऐसी लक्ष्मी की कृपा हुई ,
वो इंद्र सभा में जा बैठे और इंद्र वाहन से फूल गए 
कुछ शीतलामाता के वाहन ,सीधे सादे सेवाभावी,,
माता का जब वरदान मिला ,अपनी स्वरलहरी भूल गए 
थे कभी विचरते खुले खुले ,जब से शिववाहन बन बैठे,
शिवजी के संग पूजे जाते ,अब उनकी शान निराली है 
कुछः दुर्गाजी के वाहन ने ,ऐसा आधिपत्य जमाया है ,
उनके कारण दुर्गामाता ,कहलाती शेरांवाली है 
बिल से जब निकले कुछ मूषक ,बन गए गजानन के वाहन,
मोदक के साथ देश को भी ,वो कुतर कुतर कर खाते है
विष्णु के वाहन गरुड़ आज ,मंदिर में पूजे जाते है ,
यम के वाहन महिष  से पर ,सभी लोग घबराते है 
है हंस सरस्वती का वाहन,और उसकी शान निराली है 
पानी और दूध पृथक करता ,पर वो भी चुगता है मोती  
ये वाहन और वाहन  चालक ,चालाक बहुत सब होते है ,
साहब की सेवा करते है ,जिससे है स्वार्थसिद्धि होती  

घोटू 

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