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मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

वरदान पर प्रतिबन्ध

         वरदान पर प्रतिबन्ध

प्राचीन काल में जब भी कोई भगवान
होता था किसी पर मेहरबान
दे  दिया करता था उसको वरदान
और उनकी इस कमजोरी का ,
राक्षस बड़ा फायदा उठाते थे
थोड़े दिन तपस्या करके ,मख्खन लगाते थे
और उनको प्रसन्न कर ,मांग लेते थे एसा वर
जो कर देता था,दाता का जीना दुर्भर
जैसे कि भोले भंडारी शंकर भगवान
ने दे दिया था भस्मासुर को वरदान
कि वो जिसके सर पर हाथ रखेगा ,
वो भस्म हो जाएगा
उन्हें क्या पता था कि वो राक्षस ,
उन्ही के सर पर हाथ उठाएगा
वो तो भला हो विष्णु जी का ,
जिन्होंने रूपसी नारी का रूप धर लिया
और उस पर मुग्ध होकर ,
भस्मासुर ने अपने ही सर पर हाथ रख लिया
और खुद हो गया भस्म
वरना त्रिदेव में से एक देव हो जाता कम
महिषासुर,रावण या अन्य असुर ,
भगवान की इस कमजोरी का फायदा उठाते थे
और जिनसे वरदान पाते थे,
उन्ही के सर पर चढ़ जाते थे
हिरनकश्यप ने ,तप कर,प्रभु को प्रसन्न किया
और अपने लिए ,एक 'टेलर मेड ',फूलप्रूफ'
वरदान मांग लिया
जिसे पाकर उसका अत्याचार इतना बढ़ा
कि भगवान को ,उसके संहार के लिए ,
नरसिंह का अवतार लेकर आना पड़ा
द्रौपदी ने भगवान से,
पांच गुण वाले पति का माँगा था वरदान
पर जब नहीं मिला एसा कोई इंसान
तो भगवान ने अपना वरदान पूरा करने के लिए
उसे अलग अलग गुणवाले ,पांच पति दे दिए
कुंती को मिला था वरदान
कि   वो करेगी जिसका ध्यान
वो सामने प्रकट हो जाएगा
और उसे पुत्रवती बनाएगा
गर नहीं होता उसके पास ये वरदान मनोरथ का
तो न पांडव होते ,न कर्ण ,
और न युद्ध होता महाभारत का
तो इसतरह अपने वरदानो का दुरूपयोग ,
और प्रतिफल देख कर
तीनो देवताओं ने आपस में मिल कर
एक ये जरूरी फैसला लिया है
कि आजकल ,वरदान देने पर ,प्रतिबन्ध लगा दिया है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

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